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एक मित्रता, जिसने दुनिया बदल दी : अनंत आकाश

मार्क्स की पुण्यतिथि पर विशेष

अनंत आकाश/ एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून, 14 मार्च। इतिहास के पन्नों में मित्रता के कई किस्से दर्ज हैं, लेकिन कुछ ऐसी कहानियाँ हैं जो महज़ भावनाओं से आगे बढ़कर मानव सभ्यता की धारा को ही मोड़ देती हैं। यह कहानी है एक ऐसे वैचारिक त्रिदेव की-कार्ल मार्क्स, जैनी वॉन वेस्टफेलन और फ्रेडरिक एंगेल्स की। यह प्रेम, बलिदान और मित्रता की वह मिसाल है, जिसने न सिर्फ दुनिया को बदलने का वैज्ञानिक सिद्धांत दिया, बल्कि समाज के प्रति सर्वोच्च समर्पण का मार्ग भी प्रशस्त किया।
भूख और गरीबी के बीच एक महाग्रंथ का जन्म :- लंदन की एक तंग गली में, एक किराए के मकान में कार्ल मार्क्स “दास कैपिटल” लिखने में तल्लीन हैं। यह सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ एक वैचारिक बिगुल था। लेकिन इस बिगुल की आवाज़ को दुनिया तक पहुंचाने वाले के अपने घर में आग लगी हुई थी।
एक दिन, मकान मालकिन ने उनका सारा सामान सड़क पर फिंकवा दिया। किताबें, पांडुलिपियां, बच्चों के खिलौने – सब कुछ कीचड़ में सने हुए थे। नीलामी की घोषणा कर दी गई। मार्क्स और उनका परिवार खुले आसमान के नीचे था। ऐसे में, जैनी मार्क्स ने हिम्मत नहीं हारी। प्रशिया के राजपरिवार से ताल्लुक रखने वाली इस महिला ने अपने पुराने, घिसे-पिटे कपड़ों को समेटा, उनकी मरम्मत की और लंदन की उन गलियों में निकल पड़ीं, जहाँ कभी वे अभिजात वर्ग की महिलाओं के साथ घूमा करती थीं। आज वही जैनी, अपने पति के सिद्धांतों के लिए, उन कपड़ों को बेचने के लिए दर-बदर थी। उनकी इसी अटूट निष्ठा ने संभव बनाया कि मार्क्स की कलम रुके नहीं और दुनिया को “दास कैपिटल” जैसा अमर ग्रंथ मिल सके।
शाही ठाठ-बाट से लेकर निर्वासन तक का सफर :- जैनी सिर्फ एक पत्नी नहीं थीं, वे मार्क्स की पहली पाठक, सबसे कठोर आलोचक और सबसे विश्वसनीय सलाहकार थीं। जब मार्क्स के विद्रोही लेखन ने सत्ताधारियों की नींद हराम कर दी, तो उन्हें जर्मनी से निकाला गया। फिर फ्रांस से, फिर बेल्जियम से। हर बार जैनी ने अपने पति का हाथ थामा और निर्वासन की राह पकड़ ली।
मार्क्स ने एक बार लिखा था, “मेरे जीवन की सबसे बड़ी खुशी मेरी प्यारी जैनी है।” यह सच था। जब उनके बच्चे भूख और बीमारी से दम तोड़ देते थे, तो जैनी ही थीं जो मार्क्स के टूटे हुए मन को संभालती थीं। इतिहास गवाह है कि हर कामयाब पुरुष के पीछे एक महिला की छाया होती है, लेकिन जैनी तो खुद एक चमकता सूरज थीं, जिन्होंने मार्क्स के जीवन को आलोकित किया। पुण्यतिथि पर उस महान तपस्विनी को कोटि-कोटि नमन।
वह मित्र जिसने पूरा किया अधूरा सपना :- लेकिन इस संघर्ष में एक और नाम है, जो मार्क्स के जीवन का स्तंभ बना – फ्रेडरिक एंगेल्स। एक कुलीन उद्योगपति परिवार से होते हुए भी एंगेल्स का दिल मजदूरों के लिए धड़कता था। वे मार्क्स से सिर्फ एक दोस्त नहीं, बल्कि एक वैचारिक साथी थे। वे जानते थे कि मार्क्स की प्रतिभा दुनिया को बदल सकती है, लेकिन उनकी जेब में एक पैसा भी नहीं है। एंगेल्स ने बिना किसी शर्त के मार्क्स की आर्थिक मदद की। हर महीने भेजे जाने वाले पाउंड नोटों ने मार्क्स को वह सुरक्षा दी, जिससे वे बिना किसी चिंता के अपना महाकाव्य लिख सके। और जब 1883 में मार्क्स इस दुनिया को अलविदा कह गए, तो एंगेल्स ने अपना सब कुछ छोड़कर, मार्क्स की अधूरी पांडुलिपियों को संभाला, उन्हें संपादित किया और “दास कैपिटल” के दूसरे और तीसरे भाग को प्रकाशित कराया। उन्होंने कहा, “मेरा नाम इतिहास में एक छोटे से नोट के तौर पर आएगा, लेकिन मार्क्स का नाम हमेशा जीवित रहेगा।” यही है सच्ची मित्रता, जहाँ स्वयं को मिटाकर दूसरे के विचारों को अमर कर दिया जाता है।
विचार जो आज भी जिंदा हैं :- 5 मई 1818 को जन्मे कार्ल मार्क्स ने सिर्फ एक दर्शन नहीं दिया, बल्कि दुनिया को देखने का एक नया चश्मा दिया। उनसे पहले के दार्शनिक दुनिया की व्याख्या करते थे, लेकिन मार्क्स ने कहा, “दार्शनिकों ने केवल दुनिया की अलग-अलग तरह से व्याख्या की है, लेकिन सवाल इसे बदलने का है।” उन्होंने दुनिया को दो हिस्सों में बांटकर दिखाया – शोषक और शोषित। उन्होंने मजदूरों को एक नारा दिया, “दुनिया के मजदूरों, एक हो!” यह नारा सिर्फ एक नारा नहीं था, बल्कि सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का मंत्र था। साथियों, हमारी दुनिया ऐसे ही गुमनाम सितारों से भरी है, जिन्होंने बेहतर कल के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। जैनी का त्याग, एंगेल्स की मित्रता और मार्क्स की प्रतिभा – यह त्रिदेव आज भी हमारे मन-मस्तिष्क में जीवित हैं। आने वाली सदियों तक यह जोड़ी समाज का मार्गदर्शन करती रहेगी। कार्लर मार्क्स व उनकी पत्नी जैनी उनके मित्र एंग्लिस के बलिदान को नमन! लाल सलाम!
लेखक अनंत आकाश सीपीआई (एम) के सचिव हैं।

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