बुराइयों पर विजय के लिए गीता की आवश्यकता
संचालन अकादमी के शोध अधिकारी डा. हरीशचंद्र गुरुरानी ने किया।

हरिद्वार: उत्तराखंड संस्कृत अकादमी की ओर से संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीमद्भागवत गीता मास महोत्सव के समापन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि संस्कृत शिक्षा के संयुक्त सचिव वीरेंद्र पाल ने कहा कि गीता स्वयं में ही परिपूर्ण होने के साथ ही सभी विकारों को समाप्त करने में सक्षम है। संस्कृत भाषा का विस्तार करना आवश्यक है और जनमानस की समस्या का समाधान शासन की ओर से बनाए गए नियमों के अनुसार किया जाएगा। सभी संस्कृत अनुरागी अपने कर्म करें तो फल भी मिलेगा। सभी संस्कृत शिक्षार्थी मिलकर समाजोपयोगी पाठ्यक्रम का निर्माण करे।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए शासन के संस्कृत शिक्षा के अपर सचिव और अकादमी के सचिव रमेश कुमार ने कहा कि भागवत गीता ज्ञान का भंडार है। ज्ञान सभी में निहित है और कर्म ही सर्वोच्च है। उन्होंने कहा कि ज्ञान के साथ कर्म न हो तो ज्ञान बोझ होता है। रमेश कुमार ने कहा कि अकादमी संस्कृत के प्रचार-प्रसार और संवर्धन के लिए कटिबद्ध है और निरंतर कार्य कर रही है। संस्कृत शिक्षा निदेशालय के निदेशक शिवप्रसाद खाली ने कहा कि गीता मानव जीवन को व्यवस्थित करने वाला शास्त्र है। अकादमी की ओर से जो कार्य किए जा रहे हैं, वह सराहनीय और ऐतिहासिक है। मुख्य वक्ता पंडित ब्रह्राम हरितोष ने कहा कि कलयुग में सरतलापूर्वक मुक्ति प्राप्त करने के लिए एक ही शास्त्र है और वो है श्रीमद्भागवत गीता। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलसचिव गिरीश कुमार अवस्थी ने कहा कि गीता हमें कर्त्तव्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। संस्कृत शिक्षा उत्तराखंड के सहायक निदेशक डा. वाजश्रवा आर्य ने कहा कि श्रीमद्भागवत गीता का वैभव लगभग पांच हजार वर्ष से पूर्व जितना था, उससे अधिक आज के समय में हो गया है। संचालन अकादमी के शोध अधिकारी डा. हरीशचंद्र गुरुरानी ने किया। डा. गुरुरानी ने बताया कि उत्तराखंड संस्कृत अकादमी की ओर से गीता जयंती के उपलक्ष्य में 14 दिसंबर 2021 से 14 जनवरी 2022 तक प्रदेश के 13 जिलों में विविध विषयों में श्रीमद्भागवत मास महोत्सव का आयोजन किया गया था। गीता मास महोत्सव का तत्समय में कोविड संक्रमण के कारण समापन समारोह नहीं हो पाया। इसलिए आज गीता मास महोत्सव का समापन समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में अकादमी की प्रशासनिक अधिकारी लीला रावत, लेखाकार राधेश्याम, डा. अनिलकुमार त्रिपाठी, वेणीप्रसाद आदि उपस्थित थे।




