देहरादून में दो सौ साल पुराना एक ऐतिहासिक कुआं
"शोर्स वेल" के नाम से जाना जाता है ऐतिहासिक कुआं

देहरादून। देहरादून कलेक्ट्रेट परिसरके पीछे स्थित लगभग 200 साल पुराना ‘शौरी कुआँ’ ब्रिटिशकालीन इतिहास का एक प्रमुख और रहस्यमयी प्रतीक है। इसे वर्ष 1820-1824 के दौरान देहरादून के पहले ब्रिटिश सुपरिंटेंडेंट फ्रेडरिक जॉन शोर (एफ.जे. शौरी) ने बनवाया था। यह कुआँ लगभग 350 फीट गहरा है। इसके निर्माण में पुराने पत्थरों और मजबूत छोटी ईंटों का उपयोग किया गया तथा उस समय इसे जोड़ने के लिए उड़द की दाल के लेप का इस्तेमाल किया गया था। अंग्रेजों के जमाने में मुगल वास्तु के हिसाब से बने कुएं के निर्माण में लाहौरी ईंट का प्रयोग किया है। स्थानीय किंवदंतियों और कहानियों के अनुसार, ब्रिटिश काल में इस कुएं से जुड़े कई डरावने और दमनकारी किस्से जुड़े हैं, जिनमें स्वतंत्रता सेनानियों को प्रताड़ित करने या उनकी लाशों को इसमें फेंके जाने की बातें कही जाती हैं। देखभाल और संरक्षण के अभाव में यह ऐतिहासिक धरोहर अब जर्जर हालत में है। इसके आसपास गंदगी, काई और झाड़ियां उग आई हैं। इस ऐतिहासिक कुएं के पास ही लगभग 100 साल पुराना एक शिव मंदिर भी स्थित है। शिव मंदिर के पुजारी कहते हैं कि उनसे पहले मंदिर के पुजारी रहे उनके गुरु ने कुएं के बारे में कई कहानियां उन्हें बताई है। इस कुएं में अंग्रेज स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी देने के बाद लाशों को फेंक दिया करते थे। इस काम को बेहद गोपनीय रूप से किया जाता था ताकि, किसी को स्वतंत्रता सेनानियों की लाश ना मिले। इस दौरान अंग्रेजों ने कुछ मगरमच्छ भी इसमें छोड़ दिए थे। ताकि, यहां फेंकी जाने वाली लाशों को यह खा जाए। हालांकि, मंदिर के पुजारी कहते हैं कि इस कुएं में कई जलस्रोत होने की बात कही जाती है और यह पानी देहरादून से हरिद्वार तक जाता है। बताया जाता है कि आज भी इस कुएं से कभी-कभी भयंकर आवाजें आती है। माना जाता है कि कुएं में आज भी मगरमच्छ मौजूद हैं और जब वो ज्यादा हलचल करते हैं, तब कुएं के अंदर से आवाज आती है। कुएं की गहराई इतनी अधिक है कि अगर इसके अंदर पत्थर फेंका जाए तो काफी देर बाद नीचे टकराने पर इसकी हल्की आवाज ऊपर आती है। इसी कुएं के बीच से डाकू सुल्ताना की सुरंग का दरवाजा होने की भी चर्चा सुनी जाती है। कुएं से सटा है लोक निर्माण विभाग का कार्यालय। जिसका निर्माण 1980 में हुआ था। अंग्रेजी शासन काल में बनायी इस इमारत पर आज भी उस दौर के कई निशां मौजूद हैं। अंग्रेजों के जमाने में यहां उनके सरकारी घोड़ों का अस्तबल होता था। हालांकि किसी भी गजेटियर में न तो अस्तबल का जिक्र है और न कुएं का।
देहरादून में गहरे कुएं से जुड़ा रहस्यमयी राज आज भी अनसुलझा है। यूं तो दशकों से इस कुएं के इतिहास और इसकी हकीकत को जानने की उत्सुकता लोगों में रही है, लेकिन करीब 200 साल पुराने इस ऐतिहासिक स्थल को लेकर स्वतंत्रता दिवस पर कौतूहल बढ़ जाता है। अंग्रेजों के समय स्वतंत्रता सेनानियों की कब्रगाह के रूप में देखी जाने वाली ये जगह आज खंडहर में तब्दील हो गई है। हालात ये है कि आजादी के इतने समय बाद भी इससे जुड़ी महत्वपूर्ण बातें और मान्यताएं अब भी रहस्य बनी हुई है। इसका दस्तावेजों में जिक्र नहीं आ पाया। न कभी इसकी ऐतिहासिकता को लिखित बयां किया जा सका और न ही इसके इतिहास को कहीं जगह मिल पाई, लेकिन इसके बावजूद पीढ़ी दर पीढ़ी इसकी कहानियां और मान्यताएं आगे बढ़ती रही। ऐसा ही एक रहस्यमयी जगह यानी कुआं है, जिसका इतिहास अनसुलझा और रहस्यमयी है। देहरादून शहर के बीचों बीच जिलाधिकारी कार्यालय के ठीक पीछे करीब 200 साल पुराना कुआं है। जिस पर गुंबद नुमा स्ट्रक्चर बनाया गया है। ये कुआं करीब 350 फीट गहरा है। जिसमें पत्थर फेंकने से पता चलता है कि आज भी इसमें पानी मौजूद है। सालों साल से चली आ रही मान्यताओं से पता चलता है कि अंग्रेजों के समय में ही इसको बनाया गया था। लोक निर्माण विभाग का भवन भी इस कुएं से लगा हुआ है। यह भवन साल 1890 में बनाया गया था। जबकि, इससे लगे हुए कुएं को इससे कई पहले यहां निर्मित कर दिया गया था। अंग्रेजों के घोड़ों के लिए इसी जगह पर अस्तबल का निर्माण, तारकोल के लिए एक बड़ा स्टोर भी यहां अंग्रेजों के समय बनाया गया।
देहरादून कलेक्ट्रेट परिसर के पिछले हिस्से में लोक निर्माण विभाग के भवन में आज भी लाखोरी ईंटों और चूने-सुर्खी से बना एक विशाल गुंबददार ढांचा दिखाई देता है। यह कोई साधारण ढांचा नहीं, बल्कि दो सौ साल पुराना एक ऐतिहासिक कुआं है, जिसे इतिहास में “शोर्स वेल” के नाम से जाना जाता है।
इस कुएं का निर्माण साल 1824-25 के दौरान देहरादून के पहले ब्रिटिश सुपरिंटेंडेंट फ्रेडरिक जॉन शोर (एफ. जे. शौरी) ने करवाया था। उस दौर में पथरीली और बेहद कठोर जमीन होने के कारण दून घाटी में कुआं खोदना लगभग असंभव माना जाता था। लेकिन पेयजल की भारी किल्लत को दूर करने के लिए जॉन शोर ने कलेक्ट्रेट परिसर के इसी पिछले हिस्से में कुआं खुदवाने का काम शुरू किया। इस कुएं को जमीन के भीतर 228 फीट की अत्यधिक गहराई तक खोदा गया था, जिसे बनाने में उस समय ग्यारह हजार रुपये की राशि खर्च हुई थी। कठोर चट्टानों को काटने और मिट्टी धंसने के कारण इसके निर्माण के दौरान कुछ मजदूरों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी थी। इस कुएं ने लंबे समय तक पूरे कचहरी परिसर और आसपास के इलाके की प्यास बुझाई। इसी ऐतिहासिक कुएं के बिल्कुल पास, कलेक्ट्रेट के इसी सुनसान कोने में एक बेहद विशालकाय और पुराना बरगद का पेड़ खड़ा था, जिसे स्थानीय इतिहास और जनश्रुतियों में “फांसी का पेड़” कहा जाता था। कलेक्ट्रेट के ठीक बगल में पुरानी जिला जेल होने के कारण, ब्रिटिश शासन के दौरान यह पूरा कोना कैदियों को सजा देने का मुख्य केंद्र बन चुका था। साल 1857 की क्रांति के दौरान जब दून घाटी और जौनसार-बावर के स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत की, तो पकड़े गए बागियों को सजा देने के लिए अंग्रेजों ने इसी जगह को चुना। कहा जाता है कि देशभक्तों के भीतर खौफ पैदा करने के लिए अंग्रेजों द्वारा क्रांतिकारियों को इसी पुराने बरगद की मजबूत डालियों से लटकाकर सरेआम फांसी दी जाती थी। आजादी के बाद भी दशकों तक उपेक्षा, दीमक और उम्र के असर के कारण यह ऐतिहासिक पेड़ भीतर से बेहद कमजोर हो चुका था। आखिरकार, एक रात भारी बारिश और तेज तूफान के थपेड़ों को यह बूढ़ा बरगद सह नहीं पाया और जड़ से उखड़कर ढह गया था। अंग्रेजों ने न केवल सजा पाने वाले लोगों को फांसी देने के बाद इस कुएं में फेंक दिया। बल्कि, आजादी के दौरान अंग्रेजों की ओर से की गई बर्बरता में मारे गए लोगों के शवों को भी इसमें हमेशा के लिए दफन कर दिया जाता था।




