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लैंसडाउन चौक पर स्थित ऐतिहासिक बांस का झुरमुट

शहर के कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने का काम करता हैं बांस का झुरमुट

देहरादून। देहरादून के लैंसडाउन चौक के पास स्थित बाँस का विशाल झुरमुट शहर की एक पुरानी और महत्वपूर्ण हरी धरोहर है। देहरादून के लैंसडाउन चौक के पास स्थित बाँस के इस विशाल झुरमुट कोई साधारण पेड़ नहीं, बल्कि शहर की एक ऐतिहासिक धरोहर है। यह बाँस का झुरमुट लगभग 100 साल पुराना (ब्रिटिशकालीन) माना जाता है, जो 1920 के दशक के रिकॉर्ड में भी दर्ज है। अंग्रेजों ने इसे तेजी से कार्बन डाइऑक्साइड सोखने और कम पानी की आवश्यकता के कारण लगाया था। बाँस के झुरमुट 19वीं सदी के अंत में बने ‘इम्पीरियल फॉरेस्ट स्कूल’ (1878) और ‘फॉरेस्ट रेंजर्स कॉलेज’ का एक हिस्सा है। ब्रिटिश काल में वन अधिकारियों और रेंजर्स को व्यावहारिक रूप से सिखाने और शोध करने के लिए इसे यहाँ लगाया गया था। उस समय वैज्ञानिक यहाँ बाँस की विभिन्न प्रजातियों की विकास दर, उनकी मजबूती, स्थानीय जलवायु में उनके पनपने की क्षमता और मिट्टी के कटाव को रोकने में उनकी भूमिका पर गहन वानस्पतिक शोध करते थे। इसका उद्देश्य यह समझना था कि देश के जंगलों को बेहतर बनाने में बाँस का उपयोग कैसे किया जाए। यही ओल्ड फॉरेस्टी स्कूल आगे चलकर दो अलग-अलग संस्थानों में बदला-पहला इम्पीरियल फॉरेस्ट कॉलेज (1906) और दूसरा इंडियन फॉरेस्ट कॉलेज (1938)। समय के साथ इसी विकासक्रम में यह व्यवस्था लैंसडाउन चौक से आगे बढ़ी और कैंट क्षेत्र के चांदबाग इलाके में स्थापित हुई, जहाँ आज दून स्कूल स्थापित है। आखिरकार, यह पूरी शोध व्यवस्था कौलागढ़ स्थित आज के भव्य फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के रूप में स्थापित हुई। इस इतिहास का सबसे बड़ा सबूत यह है कि यहाँ पाई जाने वाली बाँस की ये खास प्रजातियाँ आज भी पुराने रेंजर्स कॉलेज और कौलागढ़ स्थित फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट की बाउंड्री के पास देखी जा सकती हैं। यह स्थान देहरादून की वैज्ञानिक और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। यह राहगीरों और दुकानदारों को ठंडी छांव देता है, प्रदूषण रोकता है और स्थानीय पक्षियों को आश्रय प्रदान करता है। यह हरा-भरा स्थान अब दून की ऐतिहासिक धरोहरों का एक प्रमुख और जाना-पहचाना हिस्सा बन चुका है। राजपुर रोड के याक पेट्रोल पम्प से थोड़ा आगे – हाथिबडकला, लैंसडाउन चौक पर भी बांस का रोपण ब्रिटिश काल में ही किया गया था। लेकिन सड़क चौड़ीकरण की ये भेट चढ़ गया।

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