उत्तराखंड के एक प्रमुख गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी मोहन जोशी
स्वतंत्रता आंदोलन को गति देने में विक्टर मोहन जोशी ने अहम भूमिका

संदीप गोयल/एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। मोहन जोशी की देश भक्ति की मिसाल अपने नाम को बदलने से ही मिल जाती है। उनका असली नाम ‘विक्टर जोजफ जोशी’ था। ईसाई परिवार में जन्मे मोहन जोशी को विदेशी शब्दों से चिढ़ थी। उनकी माँ प्यार से उन्हें मोहन पुकारती। स्वतन्त्रता संग्राम में हिस्सेदारी करने से पूर्व ही उन्होंने अपने नाम से जुड़े विदेशी शब्दों का प्रयोग बन्द कर दिया और अपना नाम मोहन जोशी घोषित कर दिया। इस तरह मोहन जोशी ने अपने नाम का ‘स्वदेशीकरण’ करके एक नया उदाहरण पेश किया। स्वतंत्रता आंदोलन में 26 मई 1930 को झंडा सत्याग्रह का नेतृत्व और कुमाऊं मंडल में स्वतंत्रता आंदोलन को गति देने में विक्टर मोहन जोशी ने अहम भूमिका निभाई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी विक्टर मोहन जोशी की ओर से स्वतंत्रता आंदोलन में दिए योगदान को सराहा। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन में कुमांऊ के कई से महान विभूतियों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। ऐसे ही महान क्रांतिकारी थे मोहन जोशी। मोहन जोशी ने सन् 1924 में बागेश्वर मेले में ऐसे प्रेरित करने वाले भाषण दिए। जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींद उड़ा दी। उस समय उन्हें गिरफ्तार करने के लिए 250 सशस्त्र पुलिस बल की मदद लेनी पड़ी। उन्हें तीन वर्ष का सश्रम कारावास मिला। मोहन जोशी के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रियता से महात्मा गांधी इस कदर प्रभावित हुए कि वह सन् 1929 में अल्मोड़ा आए। मोहन जोशी उन्हें बागेश्वर भी ले गए। जहां उन्होंने स्वराज आश्रम की स्थापना की।मोहन जोशी का जन्म एक फरवरी 1896 को नैनीताल में हुआ। उनका असली नाम ‘विक्टर जोजफ जोशी’ था। स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने से पहले उन्होंने अपने नाम से जुड़े विदेशी शब्द को हटा दिया और मोहन जोशी घोषित कर दिया।इलाहबाद से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अल्मोड़ा को अपनी कर्मभूमि बनाई। 1920 में क्रिश्चयन नेशनलिस्ट साप्ताहिक अखबार निकाला। माेहन जोशी के विचारों से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सदस्य चुना।बद्री दत्त पांडे का अल्मोड़ा अखबार जब ब्रिटिश शासकों के षडयंत्र से बंद हुआ तो उन्होंने शक्ति अखबार के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगाने का काम किया। ‘शक्ति’ अखबार का दो बार के संपादन किया। संपादन काल में ही मोहन जोशी एक जनवरी 1922 को गिरफ्तार किया गया। उन्हें 11 दिनों का कारावास भुगतना पड़ा।सन् 1921 के बागेश्वर मेले में ‘बेगार आन्दोलन’ जाते समय गिरफ्तार किया गया। सन् 1923 में शिवरात्रि के मेले के अवसर पर मोहन जोशी भिकियासैंण में धारा 144 के बावजूद ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भाषण दिए। गए। इसके बाद वह 1924 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन से लौटने के बाद फिर बागेश्वर पहुंचे और लोगों में जोश भरा।तीन वर्ष का कारावास उन्हें भुगतना पड़ा।मोहन जोशी ने आजादी के लिए पूरा जीवन ही समर्पित कर दिया था। 1930 में अल्मोड़ा नगर पालिका (वर्तमान महिला चिकित्सालय) में तिरंगा फहराने जा रहे मोहन जोशी ने अद्भुत साहस का परिचय दिया।नगरपालिका में 75 से अधिक गोरखा सिपाही मशीनगन, लाठियां लिए तैनात थे। धारा 144 के बावजूद मोहन जोशी अपने साथियों के साथ नगरपालिका परिसर में नारे लगाते हुए आ पहुंचे। सत्याग्रहियों को घेर कर सिपाहियों ने लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। मोहन जोशी ने तब तक तिरंगा नहीं छोड़ा जब तक अचेत होकर गिर न पड़े।इस घटना के बाद वह बीमार रहने लगे। बीमार होने के बावजूद जनवरी 1932 में मोहन जोशी को बागेश्वर में धारा 144 तोड़ने और सरकार के विरुद्ध भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें छह माह की जेल व एक सौ रुपए अर्थ दण्ड को सजा सुनाई गई। आजादी के आंदोलन के लिए संघर्ष करते हुए 4 अक्टूबर 1940 में उन्होंने अंतिम सांस ली।
विक्टर मोहन जोशी (जन्म विक्टर जोसेफ जोशी) उत्तराखंड के एक प्रमुख गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और समाज सुधारक थे , जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी।
प्रारंभिक जीवन और नाम परिवर्तन
जन्म: उनका जन्म 1 फरवरी, 1896 को नैनीताल में हुआ था।
परिवार: उनके पिता जयदत्त जोशी थे, जो कुमाऊं परिषदके प्रारंभिक नेताओं में से एक थे ।
नाम परिवर्तन: जन्म के समय उनका नाम विक्टर जोसेफ रखा गया था, क्योंकि उनका परिवार ईसाई धर्म को मानता था। स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने से पहले उन्होंने अपना विदेशी नाम त्याग दिया और मोहन जोशी के नाम से जाने जाने लगे।
स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका
पत्रकारिता: उन्होंने राष्ट्रीय जागरूकता फैलाने और औपनिवेशिक नीतियों के खिलाफ लोगों को प्रेरित करने के लिए शक्ति समाचार पत्र का संपादन किया।
कारावास: उन्होंने 1924 में बागेश्वर मेले में एक प्रभावशाली भाषण दिया, जिससे ब्रिटिश अधिकारी नाराज हो गए। पुलिस ने उन्हें भारी संख्या में पुलिस कर्मियों के साथ गिरफ्तार कर लिया और उन्होंने तीन साल कठोर कारावास भुगता।
ध्वज सत्याग्रह: उन्होंने 1930 में झंडा सत्याग्रह का नेतृत्व किया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, जिससे उन्हें रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोटें आईं, जिनसे वे कभी पूरी तरह से उबर नहीं पाए।
गांधी जी के साथ संबंध: महात्मा गांधी उनकी निष्ठा से बहुत प्रभावित हुए और 1929 में अल्मोड़ा गए। गांधी जी ने उन्हें “ईसाई समुदाय का एक उत्कृष्ट फूल” और गरीबों का सच्चा सेवक बताया।
मृत्यु और स्मृति
मृत्यु: जेल की कठिनाइयों और पुलिस की पिटाई के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। 4 अक्टूबर, 1940 को उनका निधन हो गया।
स्मृति चिन्ह: उत्तराखंड में लोग हर साल उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हैं। अल्मोड़ा में एक प्रतिमा और एक कॉलेज उनके सम्मान में नामित हैं।




