स्कूली पाठ्यक्रम में शास्त्रीय नृत्यों को शामिल करना

नई दिल्ली। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के कार्यान्वयन के जरिए स्कूली शिक्षा में भारतीय शास्त्रीय नृत्यों को शामिल करने को बढ़ावा दिया जाता है, जो कला-एकीकृत, अनुभवात्मक और बहुविषयक शिक्षा पर जोर देती है। संस्कृति मंत्रालय के अधीन स्वायत्त संस्था – कलाक्षेत्र फाउंडेशन स्कूल में कक्षा IV से VIII तक के छात्रों को सप्ताह में दो पीरियड और कक्षा XI और XII के ललित कला छात्रों को सप्ताह में लगभग 8 पीरियड भारतीय शास्त्रीय नृत्य (भरतनाट्यम) सिखाता है। यह फाउंडेशन स्कूली बच्चों को भरतनाट्यम, कर्नाटक संगीत और दृश्य कलाओं के अंशकालिक पाठ्यक्रम भी प्रदान करता है।
संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक अन्य स्वायत्त संस्था – संगीत नाटक अकादमी ने स्कूली बच्चों से जुड़ने के उद्देश्य से कला धरोहर का आयोजन किया, जिसमें प्रदर्शन कला, व्याख्यान, कार्यशालाएं और कलाकारों द्वारा प्रस्तुतियां शामिल थीं। पिछले दो वर्षों में देश भर के 67 स्कूलों के सहयोग से कार्यशालाओं का आयोजन किया गया है।
संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक अन्य स्वायत्त निकाय – सांस्कृतिक संसाधन एवं प्रशिक्षण केंद्र 1982 से राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक प्रतिभा खोज छात्रवृत्ति योजना (10-14 वर्ष) के तहत छात्रवृत्ति प्रदान करता है।
इस योजना का उद्देश्य 10 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के उन उत्कृष्ट प्रतिभाशाली बच्चों को सुविधाएं प्रदान करना है जो या तो मान्यता प्राप्त विद्यालयों में पढ़ रहे हों या पारंपरिक कला प्रदर्शन करने वाले परिवारों से संबंधित हों, ताकि उन्हें संगीत, नृत्य, नाटक के पारंपरिक रूपों के साथ-साथ चित्रकला, मूर्तिकला, शिल्प और साहित्यिक गतिविधियों जैसे विभिन्न सांस्कृतिक क्षेत्रों में विशेष प्रशिक्षण मिल सके।
संगीत नाटक अकादमी ने कला दीक्षा योजना के तहत लुप्त हो रही पारंपरिक प्रदर्शन कलाओं में 90 प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए हैं। प्रत्येक प्रशिक्षण कार्यक्रम में औसतन दस शिष्य नामांकित हैं। इस योजना के अंतर्गत गुरु को 8000 रुपये प्रति माह, सहायक गुरुओं को 6000 रुपये प्रति माह और प्रशिक्षुओं को 2500 रुपये प्रति माह दिए जाते हैं।




