भुला दिए गए आजादी महानायक के वंशज
स्वतंत्रता सेनानी उधम सिंह के पोते जीत सिंह पेट के लिए करते हैं मजदूरी

देहरादून। हमें आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों के वंशज अभी भी दयनीय स्थिति में रह रहे हैं। देश की आजादी के लिए अपने प्राणों को न्योछावर करने वाले शहीदों के कुछ वंशज जहां दैनिक मजदूरी के काम में लगे हैं, वहीं कुछ को किराने की दुकान चलाते हुए देखा गया हैं। शहीद उधम सिंह के भांजे के बेटे जीत सिंह को पंजाब के संगरूर जिले में एक निर्माण स्थल के पास देखा गया। जीत वहां पर दिहाड़ी मजदूरी कर रहे हैं। जलियावालां बाग नरसंहार का बदला लेने के लिए 1940 में उधम सिंह लंदन गए और पंजाब के तत्कालीन उपराज्यपाल माइकल ओ’डायर की हत्या कर दी। लेकिन पंजाब में बाद की सरकारों ने शहीद उधम सिंह के परिवार की कोई सुध नहीं ली।
अपनी जान कुर्बान कर जिन लोगों ने देश को आजादी में सांस लेने का हक दिलाया, आज उनके ही वंशज अपनी पहचान तक के लिए तरस रहे हैं। उनका किसी को ख्याल तक नहीं है। उन्हीं में एक हैं स्वतंत्रता सेनानी उधम सिंह के पोते जीत सिंह, जो 55 साल की उम्र में अपने पेट के लिए मजदूरी करते हैं।
शहीद सरदार उधम सिंह अविवाहित थे, इसलिए उनका कोई पुत्र नहीं था। मीडिया और ऐतिहासिक रिपोर्ट्स के अनुसार, जिन्हें ‘जीत सिंह’ कहा जाता है, वे सरदार उधम सिंह के सीधे पुत्र नहीं बल्कि उनके वंशज (पोते या चचेरे भाई के वंशज) हैं, जो बाद के समय में आर्थिक तंगी के कारण चर्चा में आए थे। सरदार उधम सिंह ने 13 मार्च 1940 को लंदन में माइकल ओ’डायर को मारकर जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया था और 31 जुलाई 1940 को उन्हें फांसी दी गई थी।
शहीद सरदार उधम सिंह अविवाहित थे और उनका कोई पुत्र नहीं था। जिन्हें जीत सिंह बताया जाता है, वे सरदार उधम सिंह के पुत्र नहीं बल्कि उनके वंशज (परिवार के पोते या प्रपोते / भतीजे के वंशज) हैं, जो पंजाब के संगरूर जिले में साधारण जीवन जीते हैं। शहीद-ए-आजम सरदार उधम सिंह के वंशज (भांजे के पोते/पौत्र) जीत सिंह पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम इलाके में दिहाड़ी मजदूरी करके अपना जीवन बसर करते रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, महान क्रांतिकारी के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय रही है और उन्हें आजीविका के लिए निर्माण स्थलों पर मजदूरी करनी पड़ी है। महान क्रांतिकारी सरदार उधम सिंह ने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए और वे अविवाहित रहे।
तात्या टोपे और अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर जैसे 1857 के महान सेनानियों और शासकों के कई वंशज आज बेहद दयनीय और संघर्षपूर्ण जीवन जीने को मजबूर हैं, जो ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षकों की अनदेखी को दर्शाता है।
1857 के विद्रोह के नायकों में से एक तात्या टोपे के वंशज बिठूर, कानपुर में संघर्ष कर रहे हैं। तात्या के पड़पोते विनायक राव टोपे को बिठूर में एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते हुए देखा गया हैं। कानपुर के बिठूर क्षेत्र में वे तब उसी घर में रह रहे थे जिसे स्वयं कभी तात्या टोपे जी ने स्थापित किया था। घर के सभी युवा बेरोजगारी की मार के चलते महाराष्ट्र पलायन कर गए थे। विनायक जी वयोवृद्धावस्था में अपनी पत्नी के साथ उस स्थान पर अपने पूर्वजों की धरोहर के संरक्षण के लिए रह रहे थे। गरीबी की ये स्थिति थी कि आधा घर कच्चा था और पूरे घर मे आज के दौर में चूने से पुताई थी। इस अवस्था मे भी वो पुरोहित कर्मों और किराएदारों के द्वारा दिये गए 1000 रुपये महीने पर जीवन यापन को विवश थे।
वहीं पश्चिम बंगाल के हावड़ा की एक तंग झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाली सुल्ताना बेगम अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के परपोते प्रिंस मिर्जा मोहम्मद बेदार बख्त की विधवा हैं। 1980 के दशक में पति के निधन के बाद से वे अत्यधिक गरीबी और संघर्षपूर्ण जीवन बिता रही हैं। वह अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की परपोती (पोते की पत्नी/पड़पोते की विधवा) के रूप में जानी जाती हैं। वह हावड़ा, पश्चिम बंगाल के एक साधारण और गरीब इलाके में छोटे से किराए के/झुग्गीनुमा मकान में रहती हैं। उन्हें गुजारा चलाने के लिए सरकार की ओर से मात्र 6,000 रुपये प्रति माह की सहायता पेंशन मिलती है, जिसमें परिवार का खर्च चलना बेहद कठिन होता है।
विनायक राव टोपे: -1857 के महान क्रांतिकारी तात्या टोपे के वंशज (पड़पोते) बिठूर (कानपुर) में सामान्य जीवन यापन करने के लिए संघर्ष करते देखे गए हैं, जहां गुजारा चलाने के लिए उन्हें छोटी-मोटी नौकरियां या किराने की दुकानें चलानी पड़ी हैं।
सुल्ताना बेगम: अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के परपोते प्रिंस मिर्जा मोहम्मद बेदार बख्त की विधवा हैं। वह पश्चिम बंगाल के हावड़ा/कोलकाता क्षेत्र में एक साधारण झुग्गी-झोपड़ीनुमा घर में अत्यंत गरीबी और तंगी का जीवन बिता रही हैं।




