देश को घृणा और हिंसा में डूबता देखकर गहरे व्यथित थे महात्मा गांधी
आप एक ओर गांधी जी की जय बोलें और दूसरी ओर मुसलमानों को देश छोड़ने के लिए बाध्य करें-ये दोनों बातें साथ-साथ नहीं चल सकतीं

देहरादून। “आज मुझे जन्मदिन की बधाइयाँ क्यों दी जा रही हैं? यदि देश की यह दशा है, तो मुझे बधाई नहीं, शोक-संदेश भेजे जाने चाहिए।” यह शब्द महात्मा गांधी ने 2 अक्टूबर 1947 को कहे थे-स्वतंत्र भारत में अपने पहले और अंतिम जन्मदिन पर।
सितम्बर 1947 में नोआखाली, बिहार और कलकत्ता में शांति स्थापित करने के प्रयासों के बाद गांधीजी दिल्ली लौटे। राजधानी विभाजन की विभीषिका से कराह रही थी। शरणार्थी शिविरों में लाखों लोग थे, सांप्रदायिक हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही थी। गांधी जी प्रतिदिन दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में पैदल घूमते, लोगों से मिलते, हिंसा रोकने की अपील करते और प्रार्थना सभाओं के माध्यम से प्रेम, करुणा तथा सर्वधर्म समभाव का संदेश देते रहे।
इसी बीच 2 अक्टूबर 1947 आया। देश-विदेश से बधाई संदेश, पुष्पगुच्छ और शुभकामनाएँ आने लगीं। लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन भी उन्हें शुभकामनाएँ देने पहुँचे। गांधीजी ने शांत स्वर में पूछा- “मुझे बधाई क्यों दी जा रही है? क्या यह अधिक उचित नहीं होता कि मुझे शोक-संदेश भेजे जाते?”
फिर उन्होंने वह घोषणा की जिसने सबको स्तब्ध कर दिया- “आज मैं 125 वर्ष जीने की अपनी इच्छा का त्याग करता हूँ। अब मैं अधिक जीना नहीं चाहता।” उन्होंने कहा कि एक समय था जब भारत उनकी आवाज़ सुनता था, लेकिन अब उन्हें ऐसा लगता है मानो उनकी पुकार जंगल में चीख की तरह गूँज रही हो-जिसे सुनने वाला कोई नहीं है। उसी दिन दिल्ली में आयोजित एक सार्वजनिक सभा को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संबोधित किया। उन्होंने विशेष रूप से हिंदुओं से कहा- “आप एक ओर गांधी जी की जय बोलें और दूसरी ओर मुसलमानों को देश छोड़ने के लिए बाध्य करें-ये दोनों बातें साथ-साथ नहीं चल सकतीं। यदि ऐसा करते हैं, तो आप गांधीजी की जय बोलना बंद कर दीजिए।”
गांधीजी के 125 वर्ष न जीने की घोषणा ने विदेशों में भी गहरा प्रभाव डाला। उनके एक फ्रांसीसी मित्र ने तार भेजकर लिखा कि गांधीजी को निराश नहीं होना चाहिए; उन्हें 125 वर्ष अवश्य जीना चाहिए, क्योंकि ईश्वर ने उन्हें एक विशेष उद्देश्य के लिए चुना है।
गांधीजी ने उत्तर में जो लिखा, वह उनकी अद्भुत विनम्रता का प्रमाण है- “यह निर्णय निराशा का नहीं, बल्कि असहायता का है। यह मान लेना अहंकार होगा कि ईश्वर का कार्य केवल उन्हीं के माध्यम से पूरा हो सकता है। यदि आवश्यकता होगी, तो ईश्वर उनसे अधिक शुद्ध, अधिक साहसी और अधिक दूरदर्शी व्यक्ति को अपना साधन बना सकता है।
उन्होंने आगे लिखा- “भगवान पर निर्णय देने का अधिकार किसी मनुष्य को नहीं है। 125 वर्ष जीने की इच्छा प्रकट करना मेरी धृष्टता थी। अब परिस्थितियाँ बदल गई हैं, इसलिए विनम्रतापूर्वक मैं उस इच्छा का सार्वजनिक त्याग करता हूँ।” गांधीजी ने यह भी लिखा कि अंग्रेज चले गए लेकिन भारतीयों के दिल से हिंसा नहीं गई। यदि स्वतंत्र भारत, स्वतंत्र होने के बाद भी, घृणा, हिंसा और पशुता में डूब जाए, तो यह केवल भारत की नहीं, पूरी मानवता की आशा पर प्रश्नचिह्न होगा। इसलिए मैं परम पिता परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ कि यदि मेरा कार्य पूरा हो चुका हो, तो मुझे “आँसुओं की इस घाटी” से अपने पास बुला ले। यह गांधीजी की पराजय की घोषणा नहीं थी। यह एक महात्मा की आत्मस्वीकृति थी-जो अपने राष्ट्र के नैतिक पतन से सबसे अधिक व्यथित था, पर अंत तक सत्य, अहिंसा और मानवता में अपना विश्वास नहीं खोया।
गांधीजी ने 125 वर्ष जीने की इच्छा इसलिए नहीं छोड़ी कि उनका सत्य और अहिंसा से विश्वास उठ गया था, बल्कि इसलिए कि वे अपने ही देश को घृणा और हिंसा में डूबता देखकर गहरे व्यथित थे। उनका यह आत्मस्वीकार आज भी हमें याद दिलाता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब उसके साथ नैतिक चेतना, धार्मिक सद्भाव और मानवीय करुणा भी जीवित रहे। गांधी का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 1947 में था।




