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वर्ष 1857 के आसपास बना था प्राचीन हनुमान मंदिर

भक्तों की आस्था का मुख्य केंद्र देहरादून का प्राचीन हनुमान मंदिर

देहरादून। देहरादून के घंटाघर के पास पलटन बाजार के मोड़ पर दाईं तरफ जिसे आजादी से पहले कैंट रोड़ के रूप में पहचाना जाता था। बाद में इसका नामकरण रामपुर मंडी रोड़ और नारी शिल्प मंदिर रोड़ (जिसे अब चकराता रोड़ कहा जाता हैं) पर प्राचीन महादेव हनुमान मंदिर स्थित है। यह मंदिर वर्ष 1857 के आसपास बना था, जो अत्यंत श्रद्धा का केंद्र है। मंदिर का शीर्ष, सिंदूरिया हनुमान, शिवलिंग और काली मां की मूर्ति उस काल की ही बनी हुई है। यह पुराना मंदिर बजरंगबली के भक्तों के लिए बहुत खास माना जाता है। मंगलवार और शनिवार को यहां भक्तों की भारी भीड़ होती है, जो हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ करने आते हैं। प्रशासनिक अभिलेखों में श्री हनुमान मंदिर 1867 में दर्ज मिलता हैं, लेकिन पुराने स्थानीय निवासियों में शामिल रहे 1 दर्शनी गेट निवासी बाबू राम गोयल ने वर्ष 1964 में अपने परिवार के सदस्यों को जानकारी प्रदान की थी कि शिवाला मंदिर (जिसे वर्तमान में प्राचीन हनुमान मंदिर कहा जाता हैं) वर्ष 1857 के आस-पास बना था। वर्ष 1978 में गीता भवन इस मंदिर का रिसीवर बन गया। वर्ष 1952 में मंदिर के पुजारी पंडित मंगलानन्द भट्ट थे। ब्रिटिशकालीन भू-अभिलेखों में मंदिर का विवरण देखा जा सकता है। मंदिर की भूमि राजो नामक महिला के नाम भू-स्वामिनी के रूप में दर्ज थी। राजो देवी कलाल जाति की एक विदुषी व धार्मिक महिला थी। उसे यह भूमि अपने पूर्वजों द्वारा प्राप्त हुई थी, जो मुजफ्फरनगर से आकर यहां पर बस गए थे। राजो देवी की कोई संतान नहीं थी। 75 वर्ष की आयु में 22 मार्च 1893 को राजो ने एक वसीयतनामा तैयार करवाया और इस वसीयत नामे में उन्होंने इस मंदिर के साथ अन्य समस्त जायदाद का मालिकाना हक अपने नाती मुरलीधर वल्द सागरमल, जाति कलाल साकिन, मौजा बनत, जिला मुजफ्फरनगर को दे दिया। इस मंदिर को उस समय शिवाला कहा जाता था। राजो की मौत के बाद महादेव मंदिर व इससे जुड़ी संपत्ति का मालिकाना हक मुरलीधर वल्द सागरमल के पास आ गया। 1936 में मुरलीधर की मृत्यु हो गई। जिसके बाद मंदिर की देखभाल की जिम्मेदारी ट्रस्ट को दी गई। ब्रिटिशराज में 1864 को घंटाघर के पास से मुख्य सड़क के नजदीक छावनी का बनी थी। मुख्य सड़क के दोनों तरफ का क्षेत्र सेना के पास आ गया था, जिसे पुराना कैंट कहा गया। जुलाई 1874 नया कैंट बन जाने के बाद पलटन बाजार, घंटाघर व उससे लगती पुराने कैंट की सभी जमीन नगर पालिका देहरादून को स्थानांतरित हो गई। इस भू-अभिलेख में प्लाट नं 26 पर यह मंदिर दर्शाया गया है।

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