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भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया ऊर्जा विभाग

देहरादून। उत्तराखंड राज्य के नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्या ने ऊर्जा विभाग में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। श्री आर्या ने ऊर्जा विभाग में जुगाड़, हेराफेरी, भ्रष्टाचार और सुनियोजित षड्यंत्र का आरोप लगाते हुए एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी को प्रबंध निदेशक के पद पर बैठाए जाने पर आपत्ति जतायी। यशपाल आर्या ने कहा कि यह एमडी की एक अनियमित पदोन्नति नहीं, बल्कि पूरे शासन प्रशासन की साख पर करारा तमाचा है। ऊर्जा विभाग योग्यता, अनुभव और नियमों के तहत नहीं बल्कि राजनीतिक संरक्षण, साठगांठ और मिलीभगत के बूते चल रहा है। श्री आर्या ने कहा कि उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि ऊर्जा विभाग भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है। यशपाल आर्या ने आरोप लगाया कि यहां नियम विरुद्ध शीर्ष पदों पर नियुक्तियां की जा रही हैं। सरकार के ऐसे फैसलों से परियोजनाएं लटक रही हैं। उनकी लागत बढ़ रही है और वित्तीय अनुशासन ध्वस्त हो रहा है। इसके गंभीर नुकसान राज्य की जनता को भुगतने पड़ रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि उच्चाधिकारियों, प्रभावशाली नौकरशाहों और राजनीतिक संरक्षण के बगैर कोई तृतीय श्रेणी कर्मचारी आखिर सीधे प्रबंध निदेशक की कुर्सी तक कैसे पहुंच सकता है। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा क्षेत्र की परियोजनाओं में निविदा प्रक्रियाओं में पारदर्शिता का अभाव, लागत में असामान्य वृद्धि, मनमाने तरीके से वित्तीय निर्णय और संदिग्ध ठेकों के आवंटन जैसे गंभीर आरोप ऊर्जा विभाग के ऊपर लगे हैं। ऐसे में क्या इन सब की डोर इसी संरक्षण तंत्र से जुड़ी है, सरकार को इसका जवाब देना चाहिए। यशपाल आर्या ने सरकार से स्पष्ट मांग करते हुए संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति से लेकर प्रबंध निदेशक पद तक की पूरी सेवा यात्रा की न्यायिक या फिर उच्च स्तरीय जांच कराये जाने की मांग उठाई है। यशपाल आर्या ने पदोन्नति प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों और कार्मिक विभाग की भूमिका की विस्तृत पड़ताल करने, इस अवधि में लिए गए सभी बड़े वित्तीय और नीतिगत निर्णयों का विशेष ऑडिट कराए जाने और दोषी अधिकारियों व संरक्षण देने वाले प्रभावशाली व्यक्तियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई किये जाने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि अगर सरकार सही मायने में पारदर्शी और सुशासन में भरोसा रखती है, तो समयबद्ध जांच की घोषणा करके दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करे। यदि सरकार ऐसा नहीं करती है, तो यह समझा जाएगा कि सरकार ने भ्रष्टाचार पर मौन सहमति दे दी है।

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