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दिगंबर भरत गिरी महाराज को भेंट किया स्वदेशी का प्रतीक गांधी जी का चरखा

चरखा भेंट करना आत्मनिर्भरता के सम्मान का सर्वोच्च माध्यम : अवधेश पन्त

संदीप गोयल/एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून, 26 अगस्त। अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं शहीद परिवार कल्याण महा परिषद (रजि.) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अवधेश पन्त द्वारा “हर घर चरखा” संकल्प के तहत श्री टपकेश्वर महादेव मंदिर के दिगंबर भरत गिरी महाराज को आज स्वदेशी का प्रतीक गांधी जी का चरखा भेंट कर सम्मानित किया।
ज्ञात हो कि श्री पंत अब तक विभिन्न क्षेत्रों में समर्पित भाव से कार्य कर रहे महान विभूतियों को 459 चरखे सम्मान स्वरूप भेंट कर चुके हैं। इस अवसर पर अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं शहीद परिवार कल्याण महा परिषद (रजि.) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अवधेश पन्त ने कहा की किसी को चरखा भेंट करना भारतीय संस्कृति, सादगी और आत्मनिर्भरता के सम्मान का सर्वोच्च माध्यम माना जाता है। यह आर्थिक स्वतंत्रता और खुद पर भरोसा रखने का संदेश देता है साथ ही यह दिखावे से दूर रहकर सरल जीवन जीने की प्रेरणा देता है। स्वदेशी का प्रतीक गांधी जी के चरखे ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय देश को एक सूत्र में पिरोया था। चरखा, एक सरल लेकिन शक्तिशाली कताई पहिया, मात्र सूत बनाने का उपकरण नहीं है, यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम और आत्मनिर्भरता का एक चिरस्थायी प्रतीक है। महात्मा गांधी से घनिष्ठ रूप से जुड़ा चरखा, भारत की स्वतंत्रता, स्थिरता और एकता की खोज का प्रतिनिधित्व करता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, चरखा ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध का एक सशक्त प्रतीक बनकर उभरा। अंग्रेजों ने भारत के वस्त्र उद्योग पर एकाधिकार कर लिया था, जिससे बाजार में मशीनों से बने कपड़ों की भरमार हो गई और स्थानीय कारीगरों का शोषण हुआ। इसके जवाब में, गांधीजी ने स्वदेशी आंदोलन के तहत भारतीयों से चरखे को अपनाने और अपना कपड़ा स्वयं कातने का आग्रह किया, जिसका उद्देश्य स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को प्रोत्साहित करना था। कताई करना अहिंसक विरोध का एक रूप बन गया, जिससे लोगों को विदेशी वस्तुओं पर आर्थिक निर्भरता से मुक्ति मिली। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अवधेश पन्त ने कहा की गांधी जी के लिए चरखा सिर्फ कपड़ा बनाने का साधन नहीं था, यह आत्मनिर्भरता, गरिमा और सशक्तिकरण का प्रतीक था। उन्होंने अपने अनुयायियों की दिनचर्या में चरखा चलाना भी शामिल किया, उनका मानना था कि इससे राष्ट्र एकजुट होगा और ग्रामीण एवं शहरी समुदायों के बीच की खाई को पाटा जा सकेगा। चरखा एक ऐसा प्रतीक बन गया जिसने सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को पार कर लिया। इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ध्वज पर प्रमुखता से दर्शाया गया था और यह गांधीजी के “स्वराज” (स्वशासन) के सिद्धांत का केंद्र था। चरखे से निर्मित खादी का कपड़ा स्वतंत्रता आंदोलन का एक सशक्त प्रतीक बन गया और इसे पहनना ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह का प्रतीक माना जाता था। चरखे की विरासत केवल चरखे के भौतिक कार्य तक ही सीमित नहीं है, यह भारत की स्वतंत्रता, दृढ़ता और स्थिरता की भावना का प्रतीक है। महात्मा गांधी द्वारा चरखे के उपयोग ने इसे एक राष्ट्रीय प्रतीक में बदल दिया, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में देश को एकजुट किया। भारत भर में मौजूद सबसे बड़े चरखे इस अटूट विरासत के प्रमाण हैं, जो हमें सादगी, एकता और आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर होने की शक्ति की याद दिलाते हैं।

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