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1901 का कलकत्ता अधिवेशन : जब गांधी ने उठाई झाड़ू

राजनीतिक मंच पर भाषण से पहले गांधी ने स्वच्छता, श्रम और सामाजिक बराबरी का दिया संदेश

देहरादून। महात्मा गांधी के सार्वजनिक जीवन को समझने के लिए केवल उनके बड़े राजनीतिक आंदोलनों को देखना पर्याप्त नहीं है। उनके विचारों की कई महत्वपूर्ण झलकियां उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में दिखाई देती हैं। ऐसी ही एक घटना 1901 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन से जुड़ी है, जब मोहनदास करमचंद गांधी ने राजनीतिक भाषण से अधिक महत्व एक दूसरे काम को दिया—स्वच्छता और श्रम को।
सन् 1901 में दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर चुके युवा बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी भारत आए और कलकत्ता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल हुए। यह वह दौर था जब गांधी अभी राष्ट्रीय राजनीति के केंद्रीय व्यक्तित्व नहीं बने थे और उन्हें ‘महात्मा’ के रूप में भी नहीं जाना जाता था। लेकिन कलकत्ता अधिवेशन ने उन्हें भारतीय राजनीतिक जीवन के साथ-साथ समाज की उन विसंगतियों को निकट से देखने का अवसर दिया, जिनसे वे आगे चलकर लगातार संघर्ष करने वाले थे।
अधिवेशन की व्यवस्था ने गांधी को किया विचलित
गांधी ने अधिवेशन में स्वयंसेवकों की कार्यप्रणाली को देखा। उन्हें महसूस हुआ कि सेवा-भाव केवल जिम्मेदारी सौंप देने से पैदा नहीं होता। कई छोटे-छोटे कामों के लिए स्वयंसेवक एक-दूसरे को आगे भेज रहे थे। गांधी के लिए यह अनुभव महत्वपूर्ण था, क्योंकि उनके विचार में सार्वजनिक जीवन में सेवा का अर्थ केवल भाषण देना या पद संभालना नहीं, बल्कि आवश्यक कार्य को स्वयं करने की तत्परता भी था। अधिवेशन के दौरान उन्होंने सामाजिक भेदभाव और छुआछूत की मानसिकता के भी कई रूप देखे। भोजन और रहने की व्यवस्था में जातिगत तथा क्षेत्रीय अलगाव की प्रवृत्तियां उन्हें खलीं। दक्षिण भारत से आए प्रतिनिधियों के लिए अलग रसोई जैसी व्यवस्थाएं उस समय समाज में व्याप्त छुआछूत और शुद्ध-अशुद्ध की धारणाओं को उजागर करती थीं। गांधी के लिए यह केवल धार्मिक या सामाजिक परंपरा का प्रश्न नहीं था। वे धीरे-धीरे इस निष्कर्ष की ओर बढ़ रहे थे कि यदि भारतीय समाज अपने ही लोगों के श्रम और स्पर्श को ऊंच-नीच के पैमाने पर देखता रहेगा, तो राजनीतिक स्वतंत्रता का उद्देश्य भी अधूरा रहेगा।
जब सफाई का सवाल सामने आया
कलकत्ता अधिवेशन की व्यवस्थाओं में स्वच्छता की स्थिति भी गांधी के लिए चिंता का विषय बनी। शौचालयों की खराब दशा और गंदगी देखकर उन्होंने इस स्थिति पर सवाल उठाया। उन्हें बताया गया कि सफाई का काम संबंधित कर्मचारियों का है। यहीं गांधी के सामने वह प्रश्न उभरा, जो आगे चलकर उनके सामाजिक दर्शन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना—क्या सफाई जैसे आवश्यक कार्य को केवल किसी विशेष जाति या समुदाय की जिम्मेदारी मान लेना उचित है? गांधी ने स्वयं सफाई के काम में हाथ लगाने का निर्णय लिया। उनके हाथ में उठी झाड़ू केवल गंदगी साफ करने का साधन नहीं थी। वह उस सामाजिक सोच के विरुद्ध एक प्रतीक बन गई थी, जिसमें श्रम को जाति के आधार पर ऊंचा या नीचा माना जाता था।
यह घटना गांधी के लिए इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि उन्होंने सामाजिक बराबरी को केवल सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि दैनिक जीवन के व्यवहार में देखने की कोशिश की।
श्रम की प्रतिष्ठा का सवाल
भारतीय समाज में सदियों से सफाई और मैला ढोने जैसे कार्यों को कुछ विशेष जातियों से जोड़ दिया गया था। इस व्यवस्था ने श्रम करने वाले मनुष्यों को सामाजिक रूप से हाशिये पर धकेल दिया, जबकि उसी श्रम पर पूरा समाज निर्भर रहा।
गांधी ने इस विरोधाभास को चुनौती दी।
उनकी सोच का सार यह था कि जिस श्रम के बिना समाज का जीवन व्यवस्थित नहीं चल सकता, उसे अपमानजनक कैसे माना जा सकता है? यदि सफाई आवश्यक है, तो सफाई करने वाला व्यक्ति सम्मान का अधिकारी क्यों नहीं होगा? आगे चलकर यही विचार गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। उनके आश्रमों में सफाई, शौचालयों की देखभाल और शारीरिक श्रम को सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में महत्व दिया गया। उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान चलाया और समाज में श्रम की प्रतिष्ठा स्थापित करने पर जोर दिया।
स्वराज का अर्थ केवल सत्ता परिवर्तन नहीं
1901 के कलकत्ता अधिवेशन का अनुभव गांधी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है कि इसने उनके सामने भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष की एक दूसरी तस्वीर रखी। अंग्रेजी शासन से राजनीतिक मुक्ति आवश्यक थी, लेकिन गांधी के चिंतन में धीरे-धीरे यह बात स्पष्ट होती गई कि भारतीय समाज को अपने भीतर मौजूद भेदभाव, असमानता, अस्वच्छता और सामाजिक जड़ताओं से भी संघर्ष करना होगा। बाद के वर्षों में उनका स्वराज का विचार केवल सत्ता हस्तांतरण तक सीमित नहीं रहा। आत्म-अनुशासन, आत्मनिर्भरता, श्रम, स्वच्छता और सामाजिक बराबरी उनके रचनात्मक कार्यक्रमों से जुड़ते गए। इस दृष्टि से 1901 की वह घटना गांधी के आगे के जीवन की दिशा की एक शुरुआती झलक दिखाई देती है। दक्षिण अफ्रीका में अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाला युवा बैरिस्टर आगे चलकर ऐसा नेता बना, जिसने स्वयं श्रम करने और सामान्य जीवन जीने को सार्वजनिक नैतिकता का हिस्सा बनाया।
झाड़ू बनी सामाजिक बराबरी का प्रतीक
गांधी के हाथ में उठी झाड़ू हमें यह याद दिलाती है कि सामाजिक परिवर्तन केवल बड़े राजनीतिक नारों से नहीं आता। वह रोजमर्रा के व्यवहार से भी पैदा होता है। अपनी गंदगी की जिम्मेदारी किसी दूसरे मनुष्य पर डाल देना और फिर उसी व्यक्ति को सामाजिक रूप से नीचा समझना—यह विरोधाभास गांधी को स्वीकार नहीं था। उनके लिए समस्या सफाई का काम करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि उस श्रम को जाति और सामाजिक दर्जे से जोड़ने वाली मानसिकता थी।
इसलिए 1901 के कलकत्ता अधिवेशन की यह घटना गांधी के जीवन-दर्शन के विकास को समझने में महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह हमें बताती है कि उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं था; वह व्यक्ति और समाज के भीतर जिम्मेदारी, आत्मसम्मान, श्रम की प्रतिष्ठा और बराबरी की भावना पैदा करने की प्रक्रिया भी थी। कलकत्ता की उस घटना में गांधी ने केवल एक गंदे स्थान की सफाई में हाथ नहीं लगाया था। उन्होंने भारतीय समाज के सामने एक सवाल भी रखा था-जिस समाज को स्वराज चाहिए, क्या वह अपनी जिम्मेदारियां स्वयं उठाने के लिए तैयार है?
यही सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है। 1901 में उठी वह झाड़ू गांधी के जीवन की कोई बड़ी राजनीतिक घटना नहीं थी, लेकिन उसमें उनके आने वाले दर्शन की एक छोटी-सी झलक अवश्य दिखाई देती है-श्रम का सम्मान, स्वच्छता की जिम्मेदारी और मनुष्य की बराबरी।
सन् 1901 का कलकत्ता (अब कोलकाता) कांग्रेस अधिवेशन वह ऐतिहासिक अवसर था जब महात्मा गांधी ने पहली बार कांग्रेस के मंच पर शिरकत की और शिविर में गंदगी देखकर खुद झाड़ू उठाकर शौचालय साफ किया था।
मुख्य बिंदु:
कांग्रेस से पहला परिचय: दक्षिण अफ्रीका से कुछ समय के लिए भारत लौटे मोहन दास करम चंद गांधी ने इस 1901 कलकत्ता अधिवेशन में हिस्सा लिया था, जिसकी अध्यक्षता दिनशा वाचा ने की थी।
गंदगी और उदासीनता: गांधीजी ने देखा कि बड़े-बड़े नेता और प्रतिनिधि अंग्रेजी में भाषण दे रहे थे और पश्चिमी शैली अपना रहे थे, लेकिन शिविर में साफ-सफाई को लेकर कोई गंभीर नहीं था और चारों तरफ गंदगी थी।
स्वयं उठाई झाड़ू: शिविर की दुर्दशा देखकर गांधी जी ने किसी का इंतज़ार किए बिना खुद झाड़ू उठाई और पाखाने (शौचालय) की सफाई का बीड़ा उठाया। प्रतिक्रिया: जब अन्य प्रतिनिधियों ने उन्हें ऐसा करते देखा तो उन्होंने पूछा कि आप यह अछूतों वाला काम क्यों कर रहे हैं? इस पर गांधीजी ने जवाब दिया कि उन्होंने खुद इस कार्य को अछूत मान लिया है, जबकि श्रम का यह कार्य पवित्र है।
इस घटना से गांधीजी ने आत्म-निर्भरता, श्रम की गरिमा और स्वच्छता का जो संदेश दिया, वह उनके जीवनभर के सिद्धांतों का अहम हिस्सा बन गया।

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