खटकड़ कलां गाँव में स्थित है महान क्रांतिकारी शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का पैतृक घर

देहरादून। महान क्रांतिकारी शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का पैतृक (पुश्तैनी) घर पंजाब के शहीद भगत सिंह नगर ज़िले (पुराना नवांशहर) के खटकड़ कलां गाँव में स्थित है। यद्यपि भगत सिंह का जन्म बंगा, लायलपुर (अब पाकिस्तान) में हुआ था, लेकिन उनके परिवार की मूल जड़ें और पैतृक घर इसी खटकड़ कलां गाँव में थीं। यह पुश्तैनी मकान लगभग 1891 में बना था। इस ऐतिहासिक धरोहर को अब सरकार और पुरातत्व विभाग द्वारा सहेज कर रखा गया है। घर के अंदर पुरानी वस्तुएं जैसे हाथ से चलने वाली आटा चक्की, चरखा, पुराने बर्तन और चारपाई आज भी रखी हुई हैं। देश के विभाजन के बाद भगत सिंह की माताजी (विद्यावंती जी) इसी घर में रहीं और उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिन यहीं बिताए थे। गाँव में भगत सिंह की याद में एक भव्य संग्रहालय और स्मारक भी बनाया गया है।
खटकर कलां एक ऐतिहासिक गाँव है जिसे सरदार किशन सिंह, सरदार अजीत सिंह, सरदार स्वर्ण सिंह, शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह जैसे प्रसिद्ध देशभक्तों और स्वतंत्रता सेनानियों का गाँव होने का गौरव प्राप्त है। खटकर कलां बंगा स्टेशन के अंतर्गत आता है। यह गांव अपनी विशेष विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध है।” “यह स्थान एक किले के रूप में जाना जाता था। इसका संबंध एक सामंती सरदार से था। इससे सटे अन्य किले भी थे, लेकिन वे इसके मुकाबले छोटे थे। इसीलिए उन्हें गढ़ खुर्द के नाम से जाना जाता था।
भगत सिंह का जन्म लायलपुर (अब पाकिस्तान के फैसलाबाद के बंगा) में हुआ और उनकी परवरिश भी वहीं हुई, लेकिन वह अपने दादा अर्जुन सिंह के साथ बचपन में छुट्टियों में पैतृक गांव खटकड़ कलां आया करते थे। भगत सिंह के छोटे भाई कुलबीर सिंह के पोते यादविंदर सिंह बताते हैं, ‘खटकड़ कलां में प्लेग फैलने के कारण ब्रिटिश सरकार ने गांव के लोगों को लायलपुर में जमीन आवंटित की थी, ताकि वे वहां खेती कर अपने परिवार का पालन कर सकें।’ प्लेग के कारण ही भगत सिंह का परिवार खटकड़ कलां छोड़कर लायलपुर चला गया था। भगत सिंह का परिवार शुरू से ही अंग्रेजों के जुल्म के खिलाफ लड़ता रहा। उनके दादा अर्जुन सिंह आर्य समाज के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उनके तीन बेटे किशन सिंह, अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह भी आजादी के आंदोलन में शामिल रहे। अजीत सिंह को ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ लहर के लिए जाना जाता है। भगत सिंह के पिता किशन सिंह के तीन बेटे थे। भगत सिंह, कुलबीर सिंह और कुलतार सिंह। भगत सिंह जब जेल में थे और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई, तो उन्होंने अपनी मां विद्यावती (पंजाब माता) को पत्र लिखा था, ‘मेरी लाश लेने के लिए आप मत आना। भाई कुलबीर सिंह को भेज देना, क्योंकि आप मेरी लाश देखकर रो पड़ोगी।’ कुलबीर सिंह बाद में फिरोजपुर से विधायक बने और फिर दिल्ली में बस गए। भगत सिंह की माता विद्यावती भी बेटे कुलबीर के साथ रहने लगीं और वहीं उनका निधन भी हुआ।
खटकड़ कलां में रहने वाले शहीद भगत सिंह के परदादा फतेह सिंह ने 1885 में यहां घर का निर्माण किया। इसे दीवान खाना कहा जाता था। इसका निर्माण इस उद्देश्य से करवाया गया था, ताकि आने-जाने वाले लोग यहां रुक सके। लोगों ने जब पूछा कि यह क्यों बनवा रहे हैं, तो उनका कहना था कि हुकूमतें तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन लोगों के लिए कोई ठिकाना तो होना चाहिए। यादविंदर सिंह बताते हैं कि इसी स्थान छत पर दो कमरें हैं। जब भगत सिंह खटकड़ कलां आते थे, तो उनमें से एक कमरे में रहते थे। अब इस पूरे मकान को हेरिटेज घोषित दिया गया है। भगत सिंह का ननिहाल गढ़शंकर (होशियारपुर) के पास मोरांवाली में है, जहां उनकी माता विद्यावती की यादगार है।
यादविंदर सिंह के अनुसार जिस दिन भगत सिंह का जन्म हुआ, उसी दिन उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह की बर्मा जेल से रिहाई हुई। भगत सिंह की दादी का कहना था कि यह बहुत भागां वाला (भाग्यशाली) है। इसके जन्म पर पिता और चाचा की रिहाई हुई है, इसलिए इसका नाम भगत सिंह रखा जाए। भगत सिंह से उनकी बहन अमर कौर को बहुत प्यार था। जब भगत सिंह जेल में कैद थे, तो उन्होंने अपने हाथ से उनकी रिहाई वाली दुआ का रुमाल तैयार किया था, जो आज भी उनके भांजे प्रो. जगमोहन सिंह के पास है।




