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जब बोए पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय ? : गरिमा

देहरादून। देहरादून में 24 वर्षीय उत्तर-पूर्वी छात्र एंजेल चकमा की निर्मम हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह उस भारत की तस्वीर है जहाँ एक छात्र को मरते समय यह कहना पड़े कि  “मैं भारतीय हूँ।” यह वाक्य पूरे देश को झकझोरने के लिए पर्याप्त है, यह कहना है उत्तराखंड कांग्रेस की नेत्री गरिमा मेहरा दसौनी का। गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा एंजेल चकमा पढ़ाई के उद्देश्य से देहरादून आया था। वह न कोई अपराधी था, न किसी आंदोलन का हिस्सा-वह सिर्फ एक छात्र था। नस्लीय गालियाँ दी गईं, उसने विरोध किया और कुछ ही मिनटों में चाकू से गोद कर उसको जख्मी कर दिया गया। यह घटना बताती है कि मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि सोच, संवेदनशीलता और शासन की गंभीर असफलता का है।

गरिमा ने कहा कि एंजेल चकमा के पिता पैरामिलिट्री फोर्सेस में अपना पूरा जीवन दे चुके हैं ऐसे में दुखद है कि उनके घर का चिराग आज धामी सरकार की लचर कानून व्यवस्था  की वजह से बुझ गया। रात में की दर्ज होने में 12 दिन की देरी पुलिस प्रशासन की उदासीनता ही दिखाता है। गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि देश के कोने-कोने से छात्र पढ़ने के लिए देहरादून को चुनते हैं इसलिए क्योंकि पिछली सरकारों ने सख्त कानून व्यवस्था दी और छात्रों और उनके माता-पिता को उत्तराखंड खासतौर पर देहरादून अपने बच्चों को भेजने के लिए सुरक्षित महसूस होता था। बाहर राज्यों के बच्चे जो यहां पढ़ने आते हैं उससे राज्य को करोड़ों का राजस्व मिलता है इस घटना से छात्र और उनके माता-पिता दोनों उत्तराखंड को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं, इस घटना से उत्तराखंड को एक अपूर्ण क्षति भी पहुंची है।

गरिमा ने कहा कि 9 दिसंबर की घटना पर सरकार का 29 दिसंबर को एंजेल चकमा के पिता से बात करना बतलाता है कि हमारी सरकार कितनी असंवेदनशील है। गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी मंचों से उत्तर-पूर्व को ‘अष्टलक्ष्मी’ कहते हैं और उसे देश का गौरव बताते हैं। लेकिन जब उत्तर-पूर्व का एक बेटा देश की राजधानी से सटे राज्य में मारा जाता है, तो केंद्र सरकार की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। गरिमा ने कहा कि यह उस बढ़ती हुई नस्लीय असंवेदनशीलता का परिणाम हैं, जिस पर केंद्र सरकार ने आँखें मूँद रखी हैं। सवाल ये उठता है कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन समय रहते क्यों नहीं हरकत में आया? यदि पहले हस्तक्षेप होता, तो शायद आज एंजेल चकमा जीवित होता।

गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि चाहे जितना भी धामी सरकार अपनी पीठ थपथपाती रही, जबकि ज़मीनी हकीकत यह है कि छात्र असुरक्षित हैं, अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं, और अब उत्तर-पूर्वी छात्र भी सुरक्षित नहीं हैं। गरिमा ने इसे भाजपा की नफरत की राजनीति का परिणाम बताया। नफरत की राजनीति का अंतिम परिणाम हमेशा हिंसा ही होता है। गरिमा ने कहा कि कांग्रेस पार्टी केवल सवाल नहीं उठा रही, बल्कि ठोस समाधान भी रख रही है। नस्लीय अपराधों को आईपीसी में अलग श्रेणी में शामिल किया जाए हर शिक्षा-नगर में North-East Student Protection Cell की स्थापना हो पुलिस, कॉलेज प्रशासन और छात्रों के लिए संवेदनशीलता प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाएएंजेल चकमा हत्याकांड में फास्ट-ट्रैक कोर्ट चलाकर त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जाए। गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि जब एक भारतीय छात्र को मरते समय कहना पड़े “मैं भारतीय हूँ”, तो यह सिर्फ एक परिवार की नहीं, पूरे देश की शर्मनाक विफलता है। यह बहस राजनीति की नहीं है यह संविधान बनाम नफरत की बहस है।

 

 

 

 

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