उत्तराखंड समाचार

नेताजी संघर्ष समिति ने किया शहीदी दिवस पर क्रांतिकारियों को याद

23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी दे दी गई

देहरादून 23 मार्च। अंग्रजों से लड़ाई लड़ते हुए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता है। अदालती आदेश के मुताबिक इन तीनों को 24 मार्च 1931 को सुबह आठ बजे फांसी लगाई जानी थी, लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी लगा दी। आज के दिन ही 23 मार्च 1931 को हुई इतिहास की इस बड़ी घटना को ”शहीद दिवस” के रूप में मनाया जाता है। 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी दे दी गई। फाँसी पर जाने से पहले भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब उनसे उनकी आखिरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि मैं लेनिन की जीवनी पढ़ रहा हूं और उसे पूरा पढ़ने का उन्हें समय दिया जाए। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले। फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले – ठीक है अब चलो। और मेरा रंग दे बसन्ती चोला, मेरा रंग दे गाते हुए तीनों क्रांतिकारी फांसी को चूमने निकल पड़े। 23 मार्च 1931 की मध्यरात्रि को अंग्रेजी हुकूमत ने भारत के तीन सपूतों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटका दिया था। ऐसा कहा जाता है कि उस शाम जेल में पंद्रह मिनट तक इंकलाब जिंदाबाद के नारे गूंज रहे थे।

नेताजी संघर्ष समिति के कार्यालय कांवली रोड पर आजादी के दीवाने क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव के शहीदी दिवस पर उन्हें याद किया गया। स्मरण रहे कि 23 मार्च के दिन तीनों क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी की सजा दी थी। इस मौके पर समिति के प्रमुख महासचिव आरिफ़ वारसी ने कहा कि हमें तीनों क्रांतिकारियों के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए, कि किस प्रकार उन में देश प्रेम की भावना थी। देश के लिए कुछ कर गुजरने की चाहत थी। समिति के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रभात डंडरियाल ने कहा कि बड़े दुख का विषय है कि आज की हमारी युवा पीड़ी ये भी नहीं जानती कि यह तीनों क्रांतिकारी कौन थे। देश के लिए उन्होंने क्या किया। हमारा परम कर्तव्य हो जाता है कि आज की युवा पीढ़ी को यह बताएं कि इन क्रांतिकारियों ने देश को किस प्रकार अंग्रेजों से मुक्त कराया। क्रांतिकारियों को याद करने वालों में आरिफ़ वारसी, प्रभात डंडरियाल, राम सिंह प्रधान, प्रदीप कुकरेती, सुशील विरवानी, रणजीत सिंह जोशी, अतुल शर्मा, सुरेश कुमार, दानिश नूर, संदीप गुप्ता आदि उपस्थित रहे।

 

 

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