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मन की बात की 135वीं कड़ी में प्रधानमंत्री के सम्बोधन का मूल पाठ (28.06.2026)

वहाँ INS दूनागिरी, INS संशोधक और INS अग्रय को भारतीय नौ-सेना के बेड़े में शामिल किया गया।

नई दिल्ली ,28.जून

मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार।

‘मन की बात’ में एक बार फिर आप सबसे जुड़कर मुझे अत्यंत आनंद हो रहा है। 2026 का आधा साल बीतने को है। इन 6 महीनों में हमने ‘मन की बात’ में देशवासियों की अनेक उपलब्धियों पर चर्चा की है। जून में भी, देश ने कुछ ऐसी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, जो हर देशवासी को गर्व से भर देती हैं। ये सफलताएँ देश की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता से जुड़ी हैं। हाल ही में मुझे कोलकाता में नौ-सेना से जुड़े एक कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। वहाँ INS दूनागिरी, INS संशोधक और INS अग्रय को भारतीय नौ-सेना के बेड़े में शामिल किया गया। इन ships की design और manufacturing तक, सब कुछ स्वदेशी है।

साथियो,

जून के महीने में ही aviation sector में भी देश ने एक बड़ी सफलता पाई। C-295, ये विमान ‘Made In India’ है और C-295 विमान ने अपनी पहली उड़ान पूरी की है, और ऐसे 40 विमान, भारत में ही बनाए जा रहे हैं। इससे MSME और Aerospace sector को नई शक्ति मिल रही है। रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। और आत्मनिर्भर भारत का संकल्प भी मजबूत हो रहा है। इसी महीने DRDO ने स्वदेशी ‘Long Range Land Attack Cruise Missile’ का भी सफल परीक्षण किया है। इसको DRDO की Laboratories और Indian Industries Partners ने मिलकर बनाया है, यानि, आज समुद्र से लेकर आकाश तक हमारा भारत अधिक सुरक्षित और आत्मनिर्भर बन रहा है।

साथियो,

जून में एक और आयोजन हुआ जिसमें पूरी दुनिया भारत के प्रयासों से जुड़ी, और ये कार्यक्रम था ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’। इस बार दुनिया के 2500 से अधिक स्थानों पर योग के अनेक विविध कार्यक्रम हुए। हमारे देश में करोड़ों लोगों ने स्थान-स्थान पर योग कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इस महीने, अहमदाबाद में आयोजित ‘विश्व योगासन चैम्पियनशिप’ की भी बड़ी चर्चा हुई। इसमें भारत ने कुल 114 पदक जीते हैं, इनमें 102 गोल्ड मेडल भी शामिल हैं। भारत इस चैम्पियनशिप की पदक तालिका में पहले स्थान पर रहा। मैं सभी विजेता खिलाड़ियों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।

साथियो,

किसी भी राष्ट्र की आत्मा उसके लोग होते हैं। और जब उस देश के लोग कोई संकल्प लेते हैं तो कोई भी शक्ति उन्हें अपने लक्ष्य से डिगा नहीं पाती। राष्ट्र निर्माण में जन-भागीदारी की ये ताकत भारत की बहुत बड़ी पूंजी है और इस जन-भागीदारी का हम बार-बार अनुभव कर रहे हैं।

साथियो,

पश्चिम एशिया में बनी युद्ध की स्थितियों को देखते हुए, मैंने देशवासियों से कुछ आग्रह किए थे। मैंने कहा था कि जहाँ तक संभव हो, कुछ समय के लिए गोल्ड, सोना खरीदने से बचें। लोगों से कहा था कि विदेश में छुट्टियाँ मनाने से बचें, मैंने लोगों से car pooling को भी बढ़ावा देने की अपील की थी, मैंने किसानों से chemical मुक्त खेती के लिए, खेत बचाने के लिए और प्राकृतिक खाद का ज्यादा-से-ज्यादा इस्तेमाल का आग्रह किया था। साथियो, मैं देश के हर नागरिक का आभारी हूँ कि मेरी अपील का उन्होंने ना सिर्फ समर्थन किया बल्कि हर तरफ से उसमें अपना सहयोग कर रहे हैं। मुझे कई परिवारों ने संदेश भेजकर अपने अनुभव साझा किए हैं। कितने ही परिवारों ने तय किया है कि घर के विवाह में इस बार सोना नहीं खरीदेंगे। जरूरत पड़ी तो पुराने सोने को recycle करके नए गहने बना लेंगे। कितने ही लोगों ने social media पर ये भी लिखा है कि कैसे उन्होंने इस बार विदेश यात्रा को टाल दिया है।

साथियो,

Car pooling को लेकर भी लोगों ने अनेक अनुभव साझा किए हैं। जो लोग हर दिन एक ही दिशा में अपने-अपने वाहनों से जाते थे, वे अब साथ जाने लगे हैं। लोग हर संभव बस और मेट्रो का उपयोग कर रहे हैं। इससे पेट्रोल और डीजल की बचत हो रही है। इसी तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में प्राकृतिक खाद की खपत बढ़ने की भी खबरें आ रही हैं। साथियो, मुझे इस बात की खुशी है, इस global crisis का हम भारतीय मिलकर मुकाबला कर रहे हैं। मुझे विश्वास है जनभागीदारी की यही शक्ति हमें मजबूती देगी, हमें सफल बनाएगी।

मेरे प्यारे देशवासियो,

हमारे देश में जन्मदिन, शादी-ब्याह पारिवारिक कार्यक्रम होने के ही साथ ही पूरे समाज का भी उत्सव होता है। हर परिवार चाहता है कि उसकी खुशियाँ दूसरों के साथ भी साझा हों। लोग मेहमानों को उपहार भी देते हैं। साथियो, महाराष्ट्र के नांदेड़ में एक परिवार ने अपनी खुशियाँ बाँटने के लिए ऐसा काम किया है जो चर्चा का विषय बन गया है। यहाँ नांदेड़ के बहादुरपुरा गाँव में पेठकर परिवार रहता है। इस परिवार ने सोचा कि अगर खुशी बाँटनी ही है, तो ऐसी चीज दी जाए, जो मुश्किल समय में किसी परिवार का सहारा बने। अपने घर में विवाह के अवसर पर इस परिवार ने गाँव के लगभग साढ़े तीन हजार लोगों के लिए दुर्घटना बीमा की व्यवस्था की। हर व्यक्ति को एक लाख रुपए का बीमा कवर दिया गया। इस पहल के पीछे की भावना बहुत स्पर्श करने वाली है। परिवार ने देखा था कि दुर्घटना के बाद परिवारों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में एक छोटी-सी सहायता भी बहुत बड़ा संबल बन जाती है।

साथियो,

सरकार देश के करोड़ों परिवारों तक सुरक्षा का कवच पहुंचा रही है। ‘प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना’ के तहत केवल 20 रुपये के सालाना premium यानि केवल एक साल के 20 रुपये का premium, उस पर दो लाख रुपये तक का ‘दुर्घटना बीमा’ मिलता है। अब तक इस योजना से 58 करोड़ से अधिक लोग जुड़ चुके हैं। इनमें करीब 28 करोड़ हमारी माताएं, बहनें, बेटियाँ हैं, महिलाएं हैं। इस योजना से पीड़ित परिवारों को अब तक जो हिसाब मिला है 3,700 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता मिल चुकी है|

साथियो उसी प्रकार से ‘प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना’ भी उतनी ही अहम है। ये योजना व्यक्ति की दुखद मृत्यु होने पर उसके परिवार को दो लाख रुपये का बीमा कवर देती है। इसका वार्षिक premium सिर्फ 436 रुपये है। मतलब एक दिन का मुश्किल से डेढ़ रुपया। इस योजना से अब तक 27 करोड़ से अधिक लोग जुड़े हैं। इसके तहत देश के करीब 11 लाख परिवारों को करीब 22 हजार करोड़ रुपये की सहायता मिल चुकी है। ये आकड़ें बहुत बड़े हैं। इन आकड़ों के पीछे लाखों परिवारों की अपनी-अपनी कहानी है। कहीं किसी माँ को बच्चों की पढ़ाई जारी रखने में सहायता मिल गई, कहीं किसी पत्नी को घर की जिम्मेदारियाँ संभालने का सहारा मिल गया। साथियो, कई बार बहुत बड़ी सुरक्षा की शुरुआत बहुत छोटी राशि और एक छोटे-से कदम से हो सकती है, छोटा-सा भी निर्णय बहुत बड़ा बदलाव करता है। मेरा आप सभी से आग्रह है कि अपने परिवार में इन योजनाओं की जानकारी जरूर साझा करें।

मेरे प्यारे देशवासियो

‘मन की बात’ में अब बात एक ऐसे विषय की जो हजारों साल पुराना है, हजारों साल से मानव समाज में घर कर करके बैठ गया है। ये विषय है – अंधविश्वास का। अंधविश्वास कई बार केवल एक गलत धारणा नहीं होता। वो डर पैदा करता है और जब डर मन पर हावी हो जाता है, तो इंसान सच को देखना ही बंद कर देता है। अंधविश्वास में डूबे लोग, फिर बिना तर्क के, बिना सत्य जाने, ऐसे फैसले लेने लगते हैं, जिनका बड़ा नुकसान होता है। वहीं समाज में ऐसे लोग भी होते हैं, जो विज्ञान, अनुभव और तर्क के आधार पर उन धारणाओं को चुनौती देते हैं। अंधविश्वास से विश्वास तक की ये यात्रा आसान नहीं होती और आज मैं ऐसी ही एक सफल यात्रा के बारे में आपको जरूर बताना चाहता हूँ।

साथियो,

असम में एक पक्षी पाया जाता है। उस पक्षी का नाम है ‘हरगिला’। ‘हरगिला’ एक दुर्लभ पक्षी है। ये प्रकृति को स्वच्छ रखने में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन असम के कुछ इलाकों में लंबे समय तक इसे अशुभ माना जाता था। लोग इसे अपने आसपास देखना पसंद नहीं करते थे। कई बार उन पेड़ों को भी काट दिया जाता था जिन पर हरगिला के घोसलें बने होते थे। सोचिए, एक ऐसा पक्षी जो पर्यावरण की सफाई में मदद करता है, वही ‘हरगिला’ लोगों के डर का शिकार बन गया था। इसी दौरान जीव-वैज्ञानिक पूर्णिमा देवी बर्मन ने ये सब देखा। उन्होंने लोगों के मन में बैठी गलत धारणा को बदलने का संकल्प लिया। उन्होंने महिलाओं से बात की, उन्होंने लोगों को विज्ञान के आधार पर समझाया, धीरे-धीरे महिलाएं इस अभियान से जुडने लगीं। फिर एक बड़ा बदलाव शुरू हुआ। जिस पक्षी को कभी अशुभ मानकर भगाया जाता था, वही गांवों की पहचान बनने लगा। हजारों ग्रामीण महिलाएं ‘हरगिला’ को बचाने के लिए आगे आईं – आज उन्हें ‘हरगिला आर्मी’ के नाम से जाना जाता है। इन महिलाओं ने समाज के साथ संघर्ष भी किया। समाज को समझाने के लिए दिन-रात काम किया और अंधविश्वास को पीछे छोड़ करके रहे। उन्होंने दिखाया है जब सही जानकारी पहुंचाई जाती है, तो वर्षों पुरानी सोच भी बदल सकती है।

साथियो,

मैं अक्सर कहता हूँ, जो खेलता है, वो खिलता है। आज देश में ऐसे युवाओं की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है, जो खेल भी रहे हैं और खिल भी रहे हैं। पहले की तुलना में अब कहीं अधिक युवा खेलों को career के रूप में अपना रहे हैं। मुझे नागालैंड के दो ऐसे प्रयासों के बारे में जानकारी मिली है, जो बहुत दिलचस्प हैं। पहला प्रयास है ‘Nagaland Baby League’. नाम सुनकर आपको जरूर लगता होगा ये बहुत छोटे बच्चों की कोई साधारण लीग होगी, लेकिन ऐसा नहीं है। ये 5 से 10-12 साल की आयु के छोटे-छोटे बच्चे, फूल जैसे बच्चों की एक असाधारण league है और इन बच्चों के football खिलाड़ियों की एक ऐसी league है, जो उनकी रफ्तार को और प्रतिभा के लिए उनको प्रेरित भी करती है और उनकी पहचान भी बनाती है। इसकी शुरुआत नागालैंड के अधिक-से-अधिक बच्चों को football से जोड़ने के लिए हुई थी। पांच से बारह वर्ष तक के लड़के और लड़कियां इसमें हिस्सा ले सकते हैं। ये league अब अपने तीन वर्ष पूरे कर चुकी है। इस लीग का बच्चों के मन पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा है।

साथियो,

नागालैंड में एक और अच्छा प्रयास हो रहा है। इसका नाम है, ‘Nagaland Women Futsal League’, हो सकता है आपके लिए ये ‘futsal’ एक नया नाम होगा, मैं आपको बताता हूँ Futsal को indoor football भी कहा जाता है। इसमें एक टीम में केवल पांच खिलाड़ी होते हैं। खेल का मैदान भी football के मैदान से बहुत छोटा होता है। इस कारण खिलाड़ियों को तेज फैसले लेने होते हैं। उन्हें अपनी technique और skill का बेहतर इस्तेमाल करना पड़ता है। नागालैंड की Women Futsal League हमारी बेटियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अच्छा अवसर दे रही है। मैं ऐसी पहलों के लिए नागालैंड के लोगों की सराहना करता हूं। ऐसे प्रयास देश के दूसरे हिस्सों को भी प्रेरणा देते हैं।

साथियो,

ये technology का युग है। हर दिन नई research हो रही है। नए-नए AI innovations सामने आ रहे हैं। इस दौर में एक सवाल बहुत महत्वपूर्ण है – लोगों की creativity को कैसे बचाए रखा जाए? नई technology के साथ आगे बढ़ते हुए हम अपनी जड़ों से कैसे जुड़े रहें? इन सवालों का समाधान खोजा है ‘नालंदा विश्वविद्यालय’ ने। हजारों साल पुरानी हमारी नालंदा विश्वविद्यालय अब नए अवतार के रूप में भारत का भाग्य गढ़ रही है। दो साल पहले मुझे नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर के लोकार्पण का अवसर मिला था । नालंदा विश्वविद्यालय ने शास्त्रार्थ की हमारी प्राचीन परंपरा को फिर से जीवंत किया है। शास्त्रार्थ केवल अपनी बात रखने का माध्यम नहीं है। ये वाद–संवाद और मंथन की एक अनुशासित प्रक्रिया है। इसमें तर्क के साथ, तथ्य के साथ, अपनी बात कहना बहुत जरूरी होता है, और उसमें आपकी महारत होनी चाहिए। दूसरों के विचारों को धैर्य से सुनने और समझने की सीख भी इस शास्त्रार्थ की प्रक्रिया से मिलती है। मुझे खुशी है कि नालंदा विश्वविद्यालय ने इसे अपने दीक्षांत समारोह का हिस्सा बनाया। इसमें भाग लेने वाले करीब आधे students अन्य देशों से आए थे। एक प्राचीन परंपरा को आज के समय से जोड़ने का ये प्रयास बहुत सराहनीय है। मैं इसके लिए नालंदा विश्वविद्यालय को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ। मैं देश के दूसरे विश्वविद्यालयों से भी आग्रह करूंगा कि वे ऐसी पहल पर विचार करें।

साथियो,

जड़ों से जुड़े रहकर युवाओं को नई technology के लिए तैयार करने का एक और अच्छा प्रयास हो रहा है। दिल्ली में स्थित Central Sanskrit University, Artificial Intelligence और Data Science में B.tech Programme शुरू करने जा रही है। ये आधुनिक technology को भारत के पारंपरिक ज्ञान से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे भारतीय भाषाओं के लिए नए AI tools तैयार करने में मदद मिलेगी। हमारे प्राचीन ग्रंथों और पांडुलिपियों को digital रूप में संरक्षित करने के काम को भी नई गति मिलेगी। मैं Central Sanskrit University को इस प्रयास के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूँ ।

साथियो,

आज भारतीय संस्कृति दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँच रही है। हमारे गीत, संगीत और आध्यात्म को दुनिया-भर के लोग जान रहे हैं और अपना रहे हैं। भारत से हजारों kilometre दूर Caribbean सागर में Dominican Republic नाम का एक देश है। वहाँ भारतीयों की संख्या करीब 100 है शायद इससे भी कम होगी। इसके बावजूद भारतीय संस्कृति और आध्यात्म से जुड़ा एक बहुत अच्छा प्रयास वहाँ हो रहा है। वहाँ Spanish बोलने वाले कुछ लोगों ने एक team बनाई है। इस team का नाम है, ‘ब्रहमकमल डोमिनिकाना’। team के सदस्य मिलकर वैदिक साहित्य का अध्ययन करते हैं। वे वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी सीख रहे हैं। उन्हें इसकी कोई formal training नहीं मिली है। लेकिन उन्होंने audio recordings सुनकर वैदिक मंत्रों का सही उच्चारण सीखा है। आज वे कई मंत्रों का बहुत अच्छे से जाप कर लेते हैं। इनमें पुरुष सूक्तम, श्री सूक्तम, श्री रुद्रम, दुर्गा सूक्तम और देवी महात्मयम शामिल हैं। भारत से इतनी दूर रहकर हमारी परंपराओं को सीखने का उनका यह प्रयास बहुत प्रेरक है। मैं ‘ब्रहमकमल डोमिनिकाना’ वहाँ के सभी सदस्यों को उनके प्रयासों के लिए शुभकामनाएँ देता हूँ। मैं ऐसे सभी लोगों की हृदय से सराहना करता हूँ जो भारतीय संस्कृति को दुनिया भर में लोकप्रिय बनाने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

मेरे प्यारे देशवासियो,

मेघालय की पहचान बादलों से है, खूबसूरत नजारों से है। जो मेघालय जाता है, उसे वहां के लोगों का अपनापन भी लंबे समय तक याद रहता है। लेकिन, मेघालय की एक और विशेषता है, जिसकी मैं आज, ‘मन की बात’ में, आपसे चर्चा करना चाहता हूं। ये है – मेघालय के रूट ब्रिज। रास्ता वाला route नहीं, जड़ों वाला root। इन रूट ब्रिजों की कहानी बहुत रोचक है। ये ब्रिज कुछ दिनों या कुछ वर्षों में नहीं बनते। इन्हें तैयार होने में कई दशक लगते हैं। रबर के पेड़ों की जड़ों को धीरे-धीरे दिशा दी जाती है। इन जड़ों को जल-धाराओं के पार ले जाया जाता है। समय के साथ वही जड़ें एक मजबूत ब्रिज का रूप ले लेती हैं। इन ब्रिजों की एक और विशेषता है। ये जीवित ब्रिज हैं। समय बीतने के साथ ये और मजबूत हो जाते हैं। इनमें मेघालय के लोगों की सृजनशीलता दिखाई देती है। इनके पीछे वर्षों का धैर्य और प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान है। ये ब्रिज बताते हैं कि मनुष्य प्रकृति के साथ मिलकर कितनी अद्भुत चीजें बना सकता है। ये हमारे देश की, इस धरती की, धरोहर है। अब भारत ने मेघालय के रूट ब्रिजों को UNESCO World Heritage Site Network में शामिल कराने के लिए आवेदन किया है।

साथियो, climate change के कारण इन रूट ब्रिजों के सामने कई चुनौतियां भी आती हैं। ऐसे समय में मेघालय के लोगों ने इस प्राकृतिक धरोहर के संरक्षण की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई है। पहले ये पता लगाना भी आसान नहीं था कि ऐसे ब्रिजों की संख्या कितनी है? स्थानीय लोगों ने खुद इनकी गिनती शुरू की। इसके बाद समुदायों ने इन ब्रिजों की देख-भाल की जिम्मेदारी भी संभाली। आज स्थानीय लोग 120 से अधिक रूट ब्रिजों की देख-रेख कर रहे हैं। कुछ टीमें हर साल इन पुलों की स्थिति की जांच करती हैं। कुछ लोगों ने आस-पास के क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए नर्सरी भी तैयार की है। इस तरह के इनके संरक्षण के लिए एक पूरा ecosystem तैयार हो गया है। आपने देखा होगा, इस वर्ष हैली वार जी को Padma Award से सम्मानित किया गया है। उन्होंने अपने जीवन के 50 से अधिक वर्ष इन रूट ब्रिजों की देखभाल में लगाए हैं। उनका समर्पण हम सभी के लिए प्रेरणादायक है| साथियो, आपने कभी इन रूट ब्रिजों की यात्रा की हो, तो उनकी तस्वीरें social media पर जरूर साझा कीजिए। आपकी तस्वीरें दूसरे लोगों को भी मेघालय की इस अनोखी धरोहर के बारे में जानने के लिए प्रेरित करेगी।

मेरे प्यारे देशवासियो,

हम सभी चाहते हैं कि हमारा गांव साफ-सुथरा हो, हमारा शहर सुंदर दिखे। लेकिन शायद ही कभी रुककर ये सोचा जाता है कि हमारे आस-पास जो कचरा जमा होता है, कौन उसे साफ करता है? ज्यादातर लोग तो यही मानकर चलते हैं कि ये किसी और की जिम्मेदारी है, और, वो ही सफाई करेगा। लेकिन हमारे बीच कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जो अपनी सोच से हमें बहुत प्रेरित करते हैं। मुझे मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा की कुछ बहनों के बारे में जानने का अवसर मिला। उन्होंने अपने आस-पास फैले plastic कचरे को हटाने का संकल्प लिया। ये नहीं सोचा कि कोई आकर बदलाव लाएगा। उन्होंने खुद शहर-भर से plastic कचरा और खाली बोतलें इकट्ठा करना शुरू किया। धीरे-धीरे ये प्रयास आगे बढ़ता गया और फिर उस plastic को eco-bricks में बदला जाने लगा। आज इन्हीं eco-bricks का उपयोग सार्वजनिक स्थानों को सुंदर बनाने में किया जा रहा है। राजगढ़ में पिछले कुछ महीनों में सैकड़ों किलो plastic को recycle करके उनका बेहतर उपयोग किया गया है। यानी, जो plastic पहले शहर में प्रदूषण फैलाता था, आज वही इन बहनों के प्रयास से शहर की सुंदरता बढ़ाने में योगदान दे रहा है। मैं ब्यावरा की सभी बहनों और इस अभियान से जुड़े साथियो को बधाई देता हूं।

मेरे प्यारे देशवासियो,

मुझे कई लोगों ने पत्र लिखकर एक खास विषय पर बात करने का सुझाव भेजा है। ये विषय ‘गणेश उत्सव’ से जुड़ा है। वैसे तो ‘गणेश उत्सव’ में अभी काफी समय बाकी है, लेकिन लोगों ने ये आग्रह किया है कि इस विषय पर अभी ही बात होनी चाहिए। दरअसल, गणेश जी की मूर्तियां बनाने का काम बहुत पहले शुरू हो जाता है। मूर्ति बनाने वाले, मूर्तियों के व्यापार से जुड़े लोग अभी से सक्रिय हो जाते हैं। इसलिए मेरा आप सभी से एक आग्रह है। आप प्रयास करें कि आपके घर, सोसायटी या आसपास की जगहों पर गणपति बप्पा की जो मूर्ति स्थापित हो, वो हमारे देश की मिट्टी से बनी हो, वो हमारे अपने कुम्हारों और स्थानीय कलाकारों के हाथों तैयार हुई हो। जो लोग गणेश जी की मूर्तियां बनाते हैं, उनसे भी मेरा आग्रह है कि वे मिट्टी की मूर्तियों को प्राथमिकता दें, और जो लोग मूर्तियां खरीदते हैं, वे भी यह जरूर देखें, कि, गणपति बप्पा की मूर्ति किससे बनी है और किस देश में तैयार हुई है। Plaster of Paris से बनी मूर्तियां बिल्कुल ना खरीदें। साथियो, मिट्टी की मूर्तियां पूजा के बाद सहज रूप से पानी में विलीन हो जाती हैं। इससे हमारी नदियां, तालाबों और पर्यावरण की रक्षा होती है। हमारी आस्था भी बनी रहती है और प्रकृति के प्रति हमारा दायित्व भी पूरा होता है। जब हम स्थानीय कारीगरों से मूर्ति खरीदते हैं, हम ‘Vocal for Local’ के संकल्प को मजबूत करते हैं। मुझे विश्वास है कि इस बार ‘गणेश उत्सव’ में और ऐसे हर उत्सव में हम ऐसी सारी बातों पर जरूर गंभीरता से सोचेंगे और देश-हित में कदम भी उठाएंगें।

साथियो,

हमारे देश की सबसे बड़ी शक्ति, हमारे देश के लोग हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे छोटे-बड़े प्रयास हमें बहुत कुछ सिखाते हैं। ये प्रयास बताते हैं कि जब मन में संकल्प हो और समाज का साथ मिले, तो कोई भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। आप अपने आस-पास हो रहे ऐसे प्रयासों के बारे में मुझे जरूर लिखते रहिए। अपने विचार और अपने सुझाव भेजते रहिए, हो सकता है आपके आस-पास की कोई छोटी-सी पहल, पूरे देश के लिए प्रेरणा बन जाए। अगले महीने हम फिर मिलेंगे। देशवासियों के कुछ नए प्रयासों की चर्चा करेंगे। तब तक आप अपना और अपने परिवार का ध्यान रखिए, और हाँ! जलसंचय तो करना-ही-करना है। बारिश के पानी की एक-एक बूँद को हमें बचाना है। ‘Catch the Rain’ ये अभियान जरा भी ढ़ीला नहीं होने देना है। तो मेरा खास आग्रह है, वर्षा का बूँद-बूँद पानी, हम मिल करके बचायें।

बहुत-बहुत धन्यवाद। नमस्कार।

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