अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के वंशज हो गए आजादी के बाद बेगाने
स्वतंत्रता के बाद अपनी ही सरकार से नहीं मिली महारानी लक्ष्मीबाई के वंशज को कोई मदद

देहरादून। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने साल 1851 में पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम दामोदर राव रखा, लेकिन तीन महीने बाद ही उनके पुत्र का निधन हो गया। अपने पुत्र की मौत के बाद राजा गंगाधर राव भी बीमार रहने लगे। रानी से उनका दुख बर्दाश्त नहीं हुआ। इसके लिए उन्होंने 20 नवंबर, 1857 को एक बालक को गोद लिया और उसका नाम भी दामोदर राव रखा। पुत्र गोद लेने के एक दिन बाद ही राजा गंगाधर राव का भी निधन हो गया। इसके बाद रानी एकदम टूट गईं और अंग्रेजों ने इसी मौके का फायदा उठाने की कोशिश की। उन्होंने रानी के इस दत्तक पुत्र को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और किले पर कब्जा कर लिया। 12 जून, 1857 में अंग्रेजों से उन्होंने युद्ध किया और अपना किला वापस हासिल कर लिया, लेकिन जख्मी अंग्रेजों ने फिर किले पर आक्रमण कर दिया इस बार रानी ने किला छोड़ने का फैसला कर लिया और अपने दत्तक पुत्र दामोदर को लेकर वहां से चली गईं। वहां से निकलकर वो ग्वालियर पहुंची, जहां अंग्रेजों के साथ उन्होंने फिर युद्ध हुआ, जिसमें रानी शहीद हो गईं। रानी लक्ष्मीबाई की वीरगति के बाद उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव का जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। दामोदर राव अपने वफादार साथियों के साथ अंग्रेजों से बचते हुए चंदेरी और बुंदेलखंड के जंगलों में कई महीनों तक छिपे रहे। वे जान बचाकर जंगलों में भटके, लगातार छिपने और आर्थिक तंगी के कारण अंततः मई 1860 में उन्होंने इंदौर में ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण किया, और अंग्रेजों ने उन्हें नाममात्र की वार्षिक पेंशन (10,000 रुपये) देने का वादा किया था, जो नाकाफी साबित हुई। उन्हें जीवित रहने के लिए अपनी माँ के दिए गहने तक बेचने पड़े थे। अपने जीवन के आखिरी दिन इंदौर में बिताते हुए 28 मई 1906 को उनका निधन हो गया। दामोदर राव के पुत्र का नाम लक्ष्मण राव था, जिन्हें ब्रिटिश सरकार से थोड़ी पेंशन मिलती थी। उनके वंशज आगे चलकर इंदौर और नागपुर क्षेत्रों में सामान्य और संघर्षपूर्ण जीवनयापन करते रहे।
जिसके बाद रानी लक्ष्मीबाई ने आनंद राव को गोद लिया था और उनका नाम दामोदर राव रखा था। रानी लक्ष्मीबाई ने गोद लिए हुए पुत्र को अपनी कमर से बांधकर अंग्रेजों का संहार किया था। आनंद राव (दामोदर राव) के पुत्र लक्ष्मण राव हुए, लक्ष्मण राव के पुत्र कृष्ण राव हुए और कृष्ण राव के पुत्र अरुण राव हुए। रानी लक्ष्मीबाई के वंशजों के इस परिवार का पैतृक घर इंदौर में है।
‘बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।’ ये लाइनें जब भी जुबां पर आती हैं, जोश का सैलाब उमड़ पड़ता है। 18 जून, 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी को हवा देने वाली लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से लड़ते हुए ग्वालियर में अपनी आखिरी सांस ली थी। अंग्रेजों द्वारा झांसी के किले पर आक्रमण करने के बाद रानी ने किला छोड़ने का फैसला कर लिया था। वहां से बाहर निकलने के लिए उन्होंने कई फीट ऊंची दीवार से घोड़े पर बैठकर छलांग लगा दी थी। शहीद होने से पहले रानी अंग्रेजों से खूब लड़ी, लेकिन उनके सामने घुटने नहीं टेके।
दामोदर राव (जन्म नाम आनंद राव) (15 नवंबर 1849 – 28 मई 1906) झांसी राज्य के महाराजा गंगाधर राव और रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र थे ।
आनंद राव का जन्म 15 नवंबर 1849 को महाराष्ट्र के जलगाँव स्थित परोला किले में वासुदेव राव नेवलकर के पुत्र के रूप में हुआ था। वासुदेव राव, राजा गंगाधर राव के चचेरे भाई थे, जिन्हें महाराजा ने अपने पुत्र की मृत्यु के बाद गोद लिया था। आनंद राव, जिनका नाम बदलकर दामोदर राव रखा गया था, को गोद लेने की प्रक्रिया महाराजा की मृत्यु से एक दिन पहले हुई थी। यह प्रक्रिया ब्रिटिश राजनीतिक अधिकारी की उपस्थिति में हुई थी, जिन्हें महाराजा का एक पत्र दिया गया था जिसमें निर्देश दिया गया था कि बच्चे के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाए और झाँसी का शासन उनकी विधवा को जीवन भर के लिए सौंप दिया जाए। 21 नवंबर 1853 को महाराजा की मृत्यु के बाद, दामोदर राव (जन्म से आनंद राव) को गोद लिए जाने के कारण, गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी के नेतृत्व में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यपगत सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) लागू किया , दामोदर राव के सिंहासन पर दावे को खारिज कर दिया और राज्य को अपने क्षेत्र में मिला लिया। जब रानी लक्ष्मीबाई को इसकी सूचना मिली, तो वे रो पड़ीं और बोलीं, “मैं अपनी झाँसी कभी नहीं दूँगी”। मार्च 1854 में, रानी लक्ष्मीबाई को 60,000 रुपये की वार्षिक पेंशन दी गई और उन्हें महल और किले को छोड़ने का आदेश दिया गया।
हालाँकि, झाँसी में विद्रोहियों की कार्रवाई और रानी तथा कंपनी के बीच वार्ता की विफलता के परिणामस्वरूप झाँसी राज्य ने अपनी स्वतंत्रता पुनः स्थापित कर ली। अंततः, कंपनी की सेनाओं ने झाँसी शहर को घेर लिया और दृढ़ प्रतिरोध के बाद, उन्होंने इसकी सुरक्षा को भेद दिया। परंपरा के अनुसार, रानी लक्ष्मीबाई दामोदर राव को अपनी पीठ पर लेकर अपने घोड़े सारंगी पर सवार होकर किले से कूद गईं और पकड़ी जाने से बच गईं। वे बच गईं लेकिन घोड़ा मर गया। अधिक संभावना है कि वह रात में अपने बेटे के साथ, पहरेदारों से घिरी हुई, भाग निकलीं।
17 जून 1858 को ग्वालियर के कोटा की सराय में रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु के बाद, वह उस युद्ध में बच गए और अपने गुरुओं के साथ जंगल में घोर गरीबी में रहने लगे। दामोदर राव द्वारा लिखित एक संस्मरण के अनुसार, वह ग्वालियर के युद्ध में अपनी माता के सैनिकों और परिवार के साथ थे। युद्ध में बचे अन्य लोगों (लगभग 60 सैनिक, 60 ऊंट और 22 घोड़े) के साथ, वह बिठूर के राव साहब के शिविर से भाग गए और बुंदेलखंड के ग्रामीणों ने अंग्रेजों से प्रतिशोध के डर से उनकी सहायता करने का साहस नहीं किया, इसलिए उन्हें जंगल में रहने और कई कठिनाइयों का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने झालरापाटन में शरण ली थी , जहां कुछ पुराने विश्वासपात्रों की मदद से उनकी मुलाकात झालरापाटन के राजा प्रतापसिंह से हुई। एक पुराने विश्वासपात्र, नानेखान ने स्थानीय ब्रिटिश राजनीतिक अधिकारी, फ्लिंक को युवा दामोदर को क्षमा करने के लिए राजी किया। अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण करने के बाद उन्हें इंदौर भेज दिया गया । यहां, स्थानीय राजनीतिक एजेंट सर रिचर्ड शेक्सपियर ने दामोदर को उर्दू , अंग्रेजी और मराठी पढ़ाने के लिए मुंशी धर्मनारायण नामक एक कश्मीरी शिक्षक की देखरेख में रखा। उन्हें केवल 7 अनुयायियों को रखने की अनुमति थी (अन्य सभी को जाना पड़ा) और उन्हें 10,000 रुपये की वार्षिक पेंशन आवंटित की गई थी। वह इंदौर में बस गए, जहाँ अंग्रेजों ने उन्हें रेजीडेंसी में घर मुहैया कराया और उन्हें 400 रुपये की पेंशन दी गई। उनकी पहली पत्नी का कुछ समय बाद निधन हो गया और उन्होंने शिवरे परिवार में दोबारा शादी कर ली। 1904 में उनका एक बेटा हुआ जिसका नाम लक्ष्मण राव था। बाद में, भारत में कंपनी शासन के अंत के बाद, उन्होंने ब्रिटिश राज से मान्यता के लिए याचिका भी दायर की, लेकिन उन्हें कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया गया। दामोदर राव शौक से एक उत्साही फोटोग्राफर थे। उनका निधन 28 मई 1906 को हुआ, उनके बेटे लक्ष्मण राव जीवित हैं।
अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के वंशज आजादी के बाद बेगाने हो गए। आजाद भारत में उन्हें गुमनामी और बदहाली का जीवन जीना पड़ा। अंग्रेज तो दामोदर राव व उनके पुत्रों को पेंशन देते रहे, लेकिन स्वतंत्रता के बाद अपनी ही सरकार से उन्हें एक पाई मदद के रूप में नहीं मिली। आर्थिक तंगी के कारण रानी के प्रपौत्र इंदौर की कचहरी में टाइपिंग कर अपने परिवार का भरण पोषण करते रहे, लेकिन सरकार ने मदद का हाथ तक नहीं बढ़ाया।अंग्रेजों की राज्य हड़पो नीति को देखते हुए झांसी के राजा गंगाधर राव व रानी लक्ष्मीबाई ने अपने पुत्र के निधन के बाद राज्य के तहसीलदार काशीनाथ हरिभाऊ के चचेरे भाई वासुदेव के पुत्र दामोदर राव को गोद ले लिया था। वासुदेव ने इस उम्मीद के साथ दामोदर राव को रानी की गोद में दिया था कि उसका पुत्र आने वाले समय में झांसी का राजा बनेगा। लेकिन, भाग्य को कुछ और ही मंजूर था।
अंग्रेजों ने गोद परंपरा को नहीं माना। 1857 में हुई क्रांति में रानी की शहादत के बाद दामोदर राव की जान को भी खतरा हो गया। ऐसे हालात में रानी के अंगरक्षक देशमुख उनको बचते बचाते किसी तरह इंदौर ले गए। दामोदर राव को वहीं पर पाला पोसा गया। वह इंदौर में ही रहने लगे। वहां माटोरकर की पुत्री के साथ उनका विवाह हो गया। 1872 में दामोदर राव की पत्नी का निधन हो गया, इसके बाद बलवंत राव की पुत्री से उनका दूसरा विवाह हुआ, जिससे लक्ष्मण राव पैदा हुए। महाश्वेता देवी की पुस्तक ‘झांसी की रानी’ के अनुसार 1870 में इंदौर में अकाल पड़ा था। इस दौरान दामोदर राव एक सूदखोर महाजन के कर्ज में फंस गए। दामोदर राव ने सहायता के लिए इंदौर के रेजीडेंट जनरल से कई बार निवेदन किया, लेकिन मदद नहीं मिली। इसके बाद दामोदर राव ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड नोर्थब्रुक से अनुरोध किया। उनके निर्देश पर रेजीडेंट ने उन्हें एक मुश्त दस हजार रुपये और दो सौ रुपये मासिक पेंशन देना स्वीकृत की। उनकी मृत्यु के बाद 100 रुपये मासिक पेंशन उनके पुत्र लक्ष्मण राव को भी मिली।
आजाद भारत होते ही सारी सुविधाएं छीन ली गईं। लक्ष्मण राव के प्रपौत्र योगेश राव के अनुसार देश की आजादी के बाद उनके परिजनों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित का प्रमाण पत्र भी नहीं मिला, इस कारण उन्हें वह सुविधाएं भी नहीं मिलीं जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों को मिल रही हैं। स्थिति यह रही कि उनके दादाजी कृष्ण राव को आजाद भारत में इंदौर की कचहरी में टाइपिस्ट का कार्य कर अपने परिवार का भरण पोषण करना पड़ा। योगेश राव अपने परिवार के साथ नागपुर में रहते हैं। वह लोकेशन गुरु सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक कंपनी में साफ्टवेयर इंजीनियर हैं।
दामोदर राव की वंशीय वंशावली :-
दामोदर राव (आनंद राव): (1849–1906)
पुत्र – श्रीमंत लक्ष्मण राव झांसीवाले: जन्म 1904, जिनका जीवन काफी संघर्षों में बीता।
पौत्र – कृष्ण राव और चंद्रकांत राव: लक्ष्मण राव के पुत्र।
प्रपौत्र (चौथी पीढ़ी) – अरुण राव (कृष्ण राव के पुत्र) और मनोहर राव।
अगली पीढ़ी (पाँचवीं व छठी पीढ़ी) – योगेश अरुण राव और उनके परिवार के अन्य सदस्य जो वर्तमान में नागपुर, इंदौर और अन्य स्थानों पर रहते हैं।



