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फासीवाद : जब डर और बेचैनी लोकतंत्र को निगल जाती है

फासीवाद सच्चाई का सिर्फ एक हिस्सा : अनन्त आकाश

अनन्त आकाश
देहरादून। फासीवाद का मतलब सिर्फ बंदूकें, जेलें और तानाशाही नहीं है। यह सच्चाई का सिर्फ एक हिस्सा है। फासीवाद पहले बंदूकों से नहीं, बल्कि दिमागों और भावनाओं में घर बनाता है। यह डर, असुरक्षा और टूटते भरोसे की जमीन में पनपता है। इतिहास गवाह है नात्सी जर्मनी या फासिस्ट इटली एक दिन में नहीं बने। वे धीरे-धीरे बने, जब लोगों ने अपना डर और बेचैनी किसी “मजबूत नेता” को सौंप दी।
जब समाज बीमार पड़ता है :- जब समाज में ये पाँच लक्षण दिखें, तो समझ लीजिए फासीवाद के बीज बोए जा रहे हैं- बेरोजगारी बढ़े, महँगाई से रसोई संकट में हो, मध्यम वर्ग टूटे, लोकतांत्रिक संस्थाओं से मोहभंग हो, और लोग एक-दूसरे से कटने लगें। जब लोग चिल्लाएँ “हमारी बात कोई नहीं सुन रहा”-तब कुछ ताकतवर लोग उनकी पीड़ा पर अपना राजनीतिक सौदा करते हैं।
फासीवाद का झाँसा :- फासीवाद वादा करता है-“देश खतरे में है, मैं अकेला तुम्हें बचा सकता हूँ। तुम्हारी परेशानियों के पीछे कोई दुश्मन है-वे लोग, वह समुदाय। बस राष्ट्र के साथ खड़े हो जाओ।” यह सरल, भावनात्मक नारा उन लोगों को चुंबक की तरह खींचता है जो असहाय महसूस कर रहे हैं। विचारक हन्ना अरेंड्ट ने लिखा कि जब इंसान खुद को राजनीतिक रूप से बेमानी पाता है, तो वह राष्ट्र, धर्म या महान अतीत जैसी “बड़ी पहचान” में शरण लेता है। कीमत चुकानी पड़ती है-अपनी आज़ाद सोच और लोकतांत्रिक अधिकार।
लोग फासीवाद की तरफ क्यों झुकते हैं? मनोविश्लेषक एरिक फ्रॉम ने कहा – “कई लोग स्वतंत्रता से डरते हैं, क्योंकि स्वतंत्रता जिम्मेदारी मांगती है।” जब जीवन अनिश्चित हो, तो लोग “आज्ञाकारी अनुयायी” बनना सुरक्षित समझते हैं। एक तानाशाह बता देता है क्या सही, किससे प्यार, किससे नफरत।
एक और खोज-कुछ लोगों में “तानाशाही व्यक्तित्व” होता है। ऐसे लोग कठोर अनुशासन और ताकतवर नेता की पूजा करते हैं, सवाल-जवाब से घबराते हैं, और दुनिया को सिर्फ काले-सफेद में देखते हैं। जब समाज संकट में होता है, तो ये लोग बड़ी संख्या में तानाशाही का समर्थन करने लगते हैं।
प्रचार-फासीवाद का सबसे ताकतवर हथियार :- नात्सी जर्मनी के प्रचार मंत्री गोएबल्स का नियम था- “अगर एक झूठ को लगातार दोहराया जाए, तो वह सच जैसा लगने लगता है।” आज यह काम सोशल मीडिया एल्गोरिदम कर रहे हैं जो गुस्सा और डर फैलाते हैं, टीवी डिबेट जहाँ चीखने वाला जीतता है, और वायरल अफवाहें। फासीवाद कभी नहीं कहेगा- महँगाई क्यों है? वह कहेगा- “तुम गरीब हो क्योंकि वे लोग तुम्हारा माल हड़प रहे हैं।”
“हम बनाम वे” :- प्रसिद्ध लेखक उम्बर्टो इको के अनुसार- “फासीवाद हर समस्या के लिए कोई न कोई दुश्मन तय करता है।” वह कहता है-“तुम पीड़ित हो, तुम्हारा गौरव छीन लिया गया। वे लोग (अल्पसंख्यक, प्रवासी, पत्रकार) तुम्हारे दुश्मन हैं।” यही तरीका है-डर को बेचना, नफरत को भुनाना।
नात्सी जर्मनी से सबक :- वहाँ शुरुआत गैस चैंबरों से नहीं हुई। पहले लोगों के मन में डर बोया गया, आर्थिक संकट का दोष यहूदियों पर डाला गया, राष्ट्रवाद का उन्माद फैलाया गया, फिर लोकतंत्र को कानून बनाकर मिटाया गया। अरेंड्ट ने इसे “बुराई की साधारणता” कहा- तानाशाही उन साधारण लोगों से चलती है जो सवाल पूछना छोड़ देते हैं और चुप रहना सुरक्षित समझते हैं।
आर्थिक संकट- फासीवाद का ईंधन :- जब बेरोजगारी बढ़ती है, कारखाने बंद होते हैं, तब शासक वर्ग जनता का ध्यान हटाने के लिए “काल्पनिक दुश्मन” बनाता है। जनता पूछे-रोटी कहाँ है? फासीवाद कहे-वे लोग तुम्हारी रोटी खा रहे हैं। काम कहाँ है? बाहरी लोग तुम्हारी नौकरी ले रहे हैं। गुस्से को गलत दिशा में मोड़ दिया जाता है।
लोकतंत्र कैसे बचाएँ? लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं, एक संस्कृति है। वह बचता है-सवाल पूछने की आदत से, असहमति के सम्मान से, सबको रोटी-दवा-किताब-इज़्ज़त से, अंधविश्वास और झूठे नारों से बचने से, मजदूरों की ताकत से, इंसानी बराबरी से, और स्वतंत्र मीडिया व शिक्षा से।
आखिरी बात :- जब जनता डरने लगती है, तब तानाशाह मजबूत होते हैं। जब जनता सोचना बंद कर देती है, तब लोकतंत्र मरने लगता है। फासीवाद “देशभक्ति”, “परंपरा” और “सुरक्षा” के सुनहरे लिफाफे में आता है। हर नागरिक खुद से पूछे-क्या मैं डर से प्रेरित हो रहा हूँ? क्या मैं अंधी नफरत कर रहा हूँ? क्या मैंने सवाल पूछना छोड़ दिया है? बंदूक तभी चलती है जब दिमाग पहले बंद हो चुका हो। जब तक दिमाग जागता है, लोकतंत्र जीवित है। लेखक अनन्त आकाश सीपीआई (एम) देहरादून के सचिव हैं.

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