बच्चों को दिलाया गया धर्म एवं संस्कारों का संकल्प
बालक-बालिकाओं का अष्टमूलगुण संस्कार कार्यक्रम संपन्न

संदीप गोयल/एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस
देहरादून। सकल दिगंबर जैन समाज एवं श्री विद्या समय पूर्ण वर्षायोग समिति, देहरादून के संयुक्त तत्वावधान में परम पूज्य वात्सल्यमयी आर्यिकारत्न श्री 105 पूर्णमति माताजी के पावन सान्निध्य में जैन अष्टमूलगुण संस्कार के अंतर्गत बालक-बालिकाओं का भव्य संस्कार कार्यक्रम जैन भवन, गांधी रोड, देहरादून में श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ आयोजित किया गया। इस अवसर पर परम पूज्य पूर्णमति माताजी ने बच्चों को धर्म, संस्कार एवं सदाचार का महत्व बताते हुए कहा कि जैन धर्म में अष्टमूलगुण श्रावक (गृहस्थ) के जीवन की आधारशिला हैं। इन मूलगुणों को अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन को संयमित, सात्विक एवं अहिंसामय बना सकता है। जैन परंपरा में सामान्यतः आठ वर्ष या उससे अधिक आयु के बच्चों को गुरु सान्निध्य में इन आठ मूलगुणों को धारण करने का संकल्प कराया जाता है। इसी पावन प्रक्रिया को अष्टमूलगुण संस्कार कहा जाता है।
माताजी ने बच्चों को इन नियमों का महत्व समझाते हुए जीवन में अहिंसा, संयम, शुद्धता, अनुशासन एवं धार्मिक आचरण अपनाने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम के अंतर्गत दोपहर 3 बजे नियमित धार्मिक कक्षा का आयोजन किया गया। इसके पश्चात संध्याकालीन आरती एवं आध्यात्मिक भजनों का भक्तिमय आयोजन हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने बड़े हर्षोल्लास एवं उत्साह के साथ भाग लिया। इस अवसर पर मीडिया कोऑर्डिनेटर मधु जैन ने बताया कि बालिका मंडल एवं युवा बालक मंडल की ओर से परम पूज्य आचार्य श्री का पूजन भी अत्यंत श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ किया गया। उन्होंने कहा कि बच्चों को बचपन से ही धर्म, संस्कृति एवं नैतिक मूल्यों से जोड़ना समाज के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। कार्यक्रम में जैन समाज की कार्यकारिणी, श्री विद्या समय पूर्ण वर्षायोग समिति के समस्त पदाधिकारी एवं सदस्य, जैन भवन कार्यकारिणी, विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारी, सदस्य तथा बाहर से पधारे अनेक धर्मप्रेमी श्रद्धालु उपस्थित रहे।
जैन श्रावक के आठ अष्टमूलगुण
जैन धर्म के प्रमुख ग्रंथों एवं परंपराओं के अनुसार अष्टमूलगुण :-
1. मद्य त्याग – शराब एवं सभी प्रकार के नशीले पदार्थों का त्याग।
2. मांस त्याग – किसी भी जीव के मांस का सेवन नहीं करना।
3. मधु त्याग – शहद का सेवन नहीं करना।
4. पांच उदुम्बर फलों का त्याग – बरगद, पीपल, पाकर, गूलर एवं अंजीर का त्याग।
5. रात्रि भोजन त्याग – सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना।
6. जीव दया का पालन – सभी जीवों के प्रति करुणा रखना तथा उनकी रक्षा करना।
7. जल छानकर पीना – सूक्ष्म जीवों की रक्षा के भाव से छने हुए जल का उपयोग करना।
8. नित्य देव दर्शन एवं पंचपरमेष्ठी का स्मरण – प्रतिदिन जिनेंद्र भगवान के दर्शन तथा अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय एवं साधु परमेष्ठी को नमस्कार करना।




