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गुमनाम क्रांतिकारियों में शामिल है नागेश्वर प्रसाद

अंग्रेजी अफसर पर गोली चलाने वाले नागेश्वर प्रसाद

देहरादून। एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे रांची के नागेश्वर प्रसाद। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में अपना पूरा यौवन देश के लिए न्यौछावर कर दिया। अंग्रेजी हुकूमत की तमाम बंदिशों के बावजूद उन्होंने अपने दो-तीन साथियों के लोहरदगा के बगड़ू पहाड़ स्थित घने जंगल में प्रेस की स्थापना की। वे इस हस्त लिखित प्रिंटिंग प्रेस के माध्यम से लोगों को क्रांति के लिए जागरूक करते थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के क्रम में उन्होंने अपने युवा साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ कई प्रदर्शनों में भाग लिया और इतिहास में काकोरी कांड की जैसी दूसरी घटना को अंजाम देते हुए अंग्रेजी सरकार के खजाने और हथियार को लूटने का काम किया। इस घटना को रांची-डालटनगंज मार्ग पर अंजाम दिया था। आजादी के आंदोलन के दौरान नागेश्वर बाबू का एक अंग्रेज अधिकारी के साथ सीधी भिड़ंत हो गयी। इन्होंने उनपर गोली चलायी, वह किसी तरह से बच गया, लेकिन जवाबी कार्रवाई करते हुए अंग्रेज अधिकारी ने भी गोली चलायी, जो उनके पैर में लगी और जीवन पर्यंत फंसी रही। यही कारण है कि आजादी के बाद अंतिम दिनों में भी वे लंगड़ाकर चलते थे। एक मुखबिर की सूचना पर 23 जुलाई 1942 को मांडर के पास घेर कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और बर्फ की सिल्लियों पर घंटों लिटा कर पिटाई की, उनके नाखूनों के बीच सूई चुभोई गयी।इसके बाद रांची जेल में सजा काटने के दौरान पत्नी की मौत हो गयी। अदालत से पेरौल नहीं मिला, तो वे जेल से भाग निकले। हालांकि श्मशान घाट पर पहले से मौजूद पुलिस ने उन्हें फिर पकड़ लिया, परंतु मुखाग्नि देने की अनुमति दी गयी और फिर वे जेल गये। स्वतंत्रता के बाद इनका इधर-उधर भागना समाप्त हुआ।
नागेश्वर प्रसाद एक स्वतंत्रता सेनानी थे और स्वर्गीय मथुरा प्रसाद के पुत्र थे। वे रांची, झारखंड के थे और उनकी जन्मतिथि 17 सितंबर 1917 थी। उनकी पत्नी का नाम सुगिया देवी था। वे स्कूल के समय से ही स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए थे। स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए उन्होंने स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी थी। वे बंकिम चंद्र की पुस्तक आनंद मठ से प्रेरित थे। नागेश्वर प्रसाद ने 31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि में रावी नदी के तट पर झंडा फहराया गया था, उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। इन सभी घटनाओं ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। उन्होंने न केवल युवाओं को प्रेरित किया बल्कि ब्रिटिश सेना में सैनिक के रूप में काम कर रहे भारतीयों को भी प्रेरित किया। वे मूल रूप से लोगरदगा और गुमला क्षेत्रों से काम करते थे। उन्होंने आज़ाद दस्ता भी बनाया वह काकोरी कांड से प्रेरित थे। उन्हें ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारी घोषित किया था। वे सच्चे समाजवादी थे। स्वतंत्रता में उनके योगदान के लिए उन्हें 15 अगस्त 1972 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से ताम्र पत्र मिला। 7 सितंबर 1986 को उनका निधन हो गया।

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